मंगलवार, 15 जून 2021

एक गधे की बात!

एक दिन घर से निकल कर पप्पू घूमते घूमते चिड़ियाघर पहुँचा तो वहाँ काफ़ी कम लोग थे। पप्पू को देख सभी जानवर बोरियत भगाने के लिये उससे कुछ मज़ेदार सुनाने की फ़रमाइश करने लगे। जानवरों की भारी माँग को देखते हुए पप्पू ने उन्हें इंसानी बेवकूफ़ियों पर एक चुटकुला सुनाया। चुटकुला पूरा होते ही चिड़ियाघर के तमाम जानवर जोर-जोर से ठहाके लगाने लगे, सिर्फ़ एक गधे को छोड़ कर। वो गधा चुटकुला सुनने के बाद भी विरक्त भाव से जुगाली करते हुए अपनी पूँछ से मक्खी भगाता रहा। पप्पू ने गधे के उदासीन भाव को देख लिया लेकिन बिना उसे टोके घर लौट गया। 

तीन दिन बाद पप्पू फिर से उसी चिड़ियाघर में पहुँचा। सभी जानवर उसे अभी चुपचाप देख ही रहे थे कि तभी अचानक बैशाखनंदन जोर जोर से ठहाके लगाने लगा। जानवर ये देख कर हैरान थे लेकिन पप्पू तत्काल उसके मन की बात समझ गया। गधा उसे यही बताने की कोशिश कर रहा था कि पप्पू का चुटकुला उसे आज पूरी तरह समझ में आ गया है। गधा तीन दिन बाद उसी चुटकुले पर पूरे पच्चीस मिनट तक हँसता रहा जिसे बाक़ियों ने उसी वक़्त समझ लिया था।

पप्पू तब से चिड़ियाघर के मुख्य विष्ठा कक्ष में उस गधे को चुपचाप चुटकुला सुना कर जाता है और उसके तीन दिन बाद सभी जानवरों को एक साथ वही चुटकुला सुनाता है, ताकि गधा उसी वक़्त सबके साथ हँस सके। इससे पता चलता है कि पप्पू को गधे तक की इज्ज़त की फ़िक्र है। पप्पू का ये कर्म सबका साथ, सबका विकास और सबका विश्वास के मूल मंत्र पर आधारित है। 

नोट - मितरों इस कहानी से हमें ये शिक्षा मिलती है कि किसी भी ( गधे ) की कमज़ोरी का मज़ाक नहीं उड़ाना चाहिये बल्कि उसकी मदद ही करनी चाहिए। वरना गधा वक़्त बेवक़्त रेंकने लगता है।

- भूपेश पन्त

मंगलवार, 1 जनवरी 2019

अपने अपने प्रस्थान बिंदु

बूढ़ा फकीर लगातार घर का दरवाज़ा खटखटा रहा था। लग रहा था कि वो भूख प्यास से व्याकुल है।

गांव के साधारण से घर में उस वक्त मौजूद बुढ़िया ने दरवाज़ा खोल कर गुस्से में कहा, 'अब क्या मुए ये दरवाज़ा भी नहीं छोड़ेगा। कमबख़्त सब कुछ खा गया फिर भी मेरी जान नहीं छोड़ता। अब क्या लेने आया है....'

फकीर ने आँसू भरी निगाहों को ऊपर उठाते हुए कहा, 'बहुत भूखा हूँ माई कुछ खाने को दे दे तेरा भला होगा..'

बुढ़िया गुस्से में आकर, .... 'कमाल है अभी भी तेरा पेट नहीं भरा। पांच साल पहले इसी तरह रुआँसा हो के आया था मेरे पास। जब पेट भर गया तो अच्छे दिन आयेंगे कह कर चला गया और तब से आज आया है।'

फकीर ने कुछ बोलना चाहा... 'वो मैं....।'

बुढ़िया अपनी रौ में थी, ....'अब रहने दे झूठ बोलना। तेरे अच्छे दिनों के चक्कर में मेरे घर के बर्तन भांडे तक बिक गये। पता नहीं तूने क्या क्या बंद करा दिया। नोट, दुकान, गाड़ी, नौकरी, खाना पीना सब कुछ। पूरा गाँव उजड़ गया। अबकी खाना खिलाऊंगी तो पता नहीं मेरा सांस लेना ही बंद न करा दे।'

फकीर, 'अरे माई सुन तो ले...'

'अब क्या सुनाएगा तू....हैं। अपनी ही मन की बात कहते रहियो। हमरी ना सुनियो बस। मन तो करता है चूल्हे की लकड़ी का धुंआ तेरी आँखों में डाल दूं पर क्या करूं कपड़े जो फकीरों वाले पहने हैं। पर मुझे तो तू इन कपड़ों में पूरा रावण लागे है जंगल वाला....' बुढ़िया जैसे बौरा सी गयी थी।

फकीर, 'लेकिन माई मैं तो पहली बार तेरे पास आया हूँ। मैंने कोई धोखा नहीं दिया। तू कहती है तो मैं तेरी चौखट से भूखा ही प्रस्थान कर जाता हूँ। लेकिन बता रहा हूँ वो कोई और था जो तुझे बेवकूफ़ बना कर प्रस्थान कर गया।'

बुढ़िया झल्ला कर बोली, 'करमजले मुझे बेवकूफ़ बता रहा है। वही ट्रिम की हुई सफेद दाढ़ी, वही कुटिल मुस्कान, वही इस्तरी किये हुए डिजाइनर भगवा वस्त्र, वही भीख का चमकता कटोरा और झोले में वही झूठे वायदे। मेरी आँखों में भले ही दो साल से मोतियाबिंद उतर गया हो लेकिन तेरी शक्ल मैं आज तक नहीं भूली। खबरदार जो अब कभी मेरा दरवाज़ा खटखटाया तो। चल भाग यहां से....'

फकीर ने अपनी बेतरतीब दाढ़ी पर कांपता हाथ फेरा। फटे पुराने कपड़ों पर पड़ी धूल को झाड़ा और लड़खड़ाते हुए लौटने लगा। किसी ने फकीर बन कर उससे फकीरी करने का हक भी छीन लिया था। इंसानियत भी न जाने कहाँ प्रस्थान कर गयी कि माई ने उसकी बात तक नहीं मानी। क्या कोई इस हद तक भी किसी का विश्वास तोड़ सकता है क्या। अपनी आख़िरी उम्मीद से नाउम्मीद हो वो फकीर अपना झोला उठाये उदास मन से न जाने किस दिशा में बढ़ चला। ऊपर भगवा से आसमान में फैलती लाली बता रही थी कि सूरज तेजी के साथ अपने प्रस्थान बिंदु की ओर बढ़ रहा है।

- भूपेश पंत

वो है डॉन!

कुछ फेरबदल के साथ रिलीज हुई डॉन सीरीज की इस नयी फिल्म की संवाद अदायगी, गीत संगीत और एक्शन आज भी ब्लॉक ब्लस्टर है। आज भी डॉन को समझ पाना मुश्किल ही नहीं नामुमकिन है जैसे डायलॉग पर दर्शक तालियाँ पीट पीट कर पागल हो रहे हैं। वो आज भी देखने में सफेदपोश है। बड़े बड़े जहाजों में विदेश घूमता है। वो एक जगह पर और अपने कहे पर बहुत देर नहीं रुकता। वो आज भी फेंके हुए पैसे नहीं उठाता लेकिन खुद बहुत फेंकता है। उसके फेंके हुए शब्द उन विरोधियों के कानों में पिघले शीशे की तरह टपकते हैं जिन्हें अपने दिमाग़ पर बहुत भरोसा है। जो लोग दर्द से चिल्लाते भी हैं उन्हें वो पुलिस का कुत्ता बता कर गोली मरवा देता है। आज भी कई देशों में पुलिस उसके द्वारा भगाये गये लोगों को ढूँढ रही है। उसके भीतर उस जैसा जो मर चुका है उसका पता किसी को नहीं है। लिहाज़ा उसे आज भी डबल रोल का फायदा उठा कर कानून और दर्शकों को चकमा देना आता है। अपनी अय्यारी के दम पर वो अलग अलग मौकों पर अपने बयान और हाव भाव बखूबी बदल सकता है। आज भी पूरे गैंग में उसका दाहिना हाथ एक ही है। हालाँकि वो आज भी किसी पर भरोसा नहीं करता। उसके गैंग के सड़क छाप गुंडे अब समाज में सम्मानित हैं और बदले में उसके खिलाफ़ उठने वाली हर आवाज का टेंटुआ दबा देते हैं। उन्हें केवल आदेश का पालन करना धर्म की घुट्टी में पिलाया गया है। इस बार उसे मामूली से डॉन बनाने वाला खुद सीन से नदारद है और नया वरधान सब जानते हुए भी उसके अभिनय पर हैरान है। आक्रामकता में ही बचाव है और इसलिए वो भी अपने दुश्मन को संभलने का मौका नहीं देता। जो लोग उसकी असलियत बता कर उसे पकड़वा सकते हैं उन्हें वो पहले ही काला चोर साबित कर चुका है। अब देश की पुलिस और जनता काले चोरों के पीछे पड़ी है और डॉन क्योटो जैसी जगमगाहट के बीच मजे में बनारसी पान खाइके छोरा गंगा किनारे वाला पर कूल्हे मटका रहा है।

- भूपेश पंत

कबूतरखाना!

कभी कबूतरों को देखा है
गर्वीली गरदन लेकर
अपने आप से गुटरियाते
दाने चुगते
अपनी धुन में मग्न
किसी की याद दिलाते
ये कबूतर
उनकी अकड़
और
खिड़कियों से आती
बकर बकर की
आवाज़
बहुमंजिला इमारतों के किसी
दड़बे में
आपको रात दिन
चैन से रहने नहीं देती
ये झुंड में रहते हैं
गंदगी फैलाते हैं
उनकी सतत गुर्राहट में
किसी अनजानी बिल्ली का ख़ौफ़ है
और
एक चेतावनी भी
कभी
वो क़ासिद बन कर
प्यार मुहब्बत
के
संदेश पहुंचाते थे
आज उसके अंतर्जालीय रूप
के सहारे
नफ़रत के पर्चे बांटे जाते हैं

एक दिन
मेरा भी सामना हुआ
एक कबूतर से
जो गलती से आ फंसा
घर के एक कमरे में
उसे लगा
मैं उसे नुकसान पहुंचाना चाहता हूँ
लेकिन
मैं तो कमरे के कीमती सामान को
उसकी फड़फड़ाहट से
बचाने के लिये
बस बाहर निकालना चाहता था
वो कई बार
मुझ पर झपटा
ख़ौफ़ में
कोई भी ऐसा ही करता
लेकिन
वो तो मुझ पर
बीट करके भाग गया

मेरी कबूतरों से
कोई
व्यक्तिगत दुश्मनी नहीं है
वो निश्चित ही
होते हैं
शांत, सरल और गंभीर
इस तरह से सतर्क
जैसे हर पल सता रहा हो
मौत का भय उन्हें
सच तो ये है
कि
इसके लिये
वो इंसान ज़िम्मेदार हैं
जिन्होंने मुझे
ये राय बनाने पर मज़बूर किया
कि
इंसानी कबूतरखाने के
आसमान में उड़ता
हर कबूतर
शांतिदूत नहीं होता।

- भूपेश पंत

एकल अभिनय!

वो नेता है
वो ही अभिनेता है
वो पक्ष है
और
वो ही विपक्ष है
वो अकेले ही सुनता है
वो अकेले ही बोलता है
उसे अकेला होना
इतना पसंद है
कि
वो जा बैठा है
सत्ता के शीर्ष पर
अब वो ही जनता है
और
वो ही शासक
इस रंगमंच पर
उसका
अकेला होना जरूरी है
और
तालियां बजाना
दर्शकों की
विकल्पहीन मजबूरी है
वो हमेशा से चाहता था
अकेला हो कर
अपनी ताकत का
अहसास करना
इसलिए
अपनी पटकथा में
वो
अपने खिलाफ़ भी
अपनी पसंद से ही चुनता है
किरदार
और
भरोसा दिलाता है
कि
जन्मा है वही एक
अवतार
करने सबका उद्धार
वो चाहता है
एक डर
एक सुर
एक उन्माद
एक मौका
एक पार्टी
एक फूल
एक पेड़
एक रंग
एक धर्म
और
एक सत्ता
वो इसे ही
कहता है एकता
वो
एक की इच्छा से
पूरी जनता को हाँक कर
बहुदलीय लोकतंत्र को
बनाना चाहता है
एकाकार
कई पात्रों से होकर गुजरता
उसका एकल अभिनय
अकसर
कर जाता है
भावनाओं की सीमा पार
और
देर तक
तालियों की गड़गड़ाहट
से गूंजता सभागार
बता देता है उसे
कि
दशकों से अंधे, बहरे
और
मूक दर्शकों को
आज भी
सेवक की नहीं
एक अदद
तानाशाह की है
दरकार
तो बोलो, अबकी बार....!

- भूपेश पंत

हलचल होगी!

खुद सवाल बनेगी खुद ही हल होगी
तुझको लिख डालूंगा तो गज़ल होगी।

उम्मीदों के दिये तुम जला कर रखना
झोपड़ी भी कभी देखना महल होगी।

चाहे लाख तोड़ लें वो जहां के आइने
आईना इक रोज उनकी शकल होगी।

जानती ही होगी वो मेरे मन की बात
सरकार है थोड़े ही कम अकल होगी।

पा लिया है जो ऊँचा सियासी मुकाम
तेरी भी हर एक बात बस छल होगी।

सबको पीस देगी ये वक़्त की चक्की
इस रात की भी तो सुबह कल होगी।

आयेंगे तो मांगना जुमलों का हिसाब
इस बहाने ही एक नयी पहल होगी।

बांध कर परिंदों के पर ये कहा उसने
उड़ने से फ़िज़ाओं में हलचल होगी।

किस रास्ते पर जाएगी ये नयी पीढ़ी
इंसानियत की राह जो ओझल होगी।

लिखूंगा तभी किसी के गेसुओं पे जो
मुश्किलात वतन की सारी हल होगी।

- भूपेश पंत

सोमवार, 31 दिसंबर 2018

नव वर्ष में कदम बढ़ाएं

तारीखें बदलती हैं
हर रोज
फिर एक दिन
पूरा साल बीत कर
इतिहास में हो जाता है
दर्ज
आओ देखें
कितना बचा
और कितना चुकाया
इंसानियत का
कर्ज

इससे पहले कि
लोकतंत्र का
पांच वर्षीय महापर्व
हम सब मनाएं
इतिहास के इन पन्नों को
पलटाएं
सदियों पहले नहीं
सिर्फ
पांच साल पीछे जाएं


कितनी
मिली सुविधाएं
खत्म हुईं
कितनी दुविधाएं
बचीं या फिर
मर गयीं संवेदनाएं

इससे पहले
कि
इसके या
उसके पक्ष में नारे लगाएं
तय करें
काले धन के नाम
पर कहीं
मन काले न हो जाएं

बेटों को पढ़ाएं
कि
बेटियां कैसे बचायें
खत्म हों
कैसे समाज से
पुरुषत्व की क्रूर दासताएं

खेत खलिहानों में
पसीने की तरह
खून टपकाते
हाथों से
दो जून रोटी खाएं
तो कभी
शांत पहाड़ी वादियों में
अपने हक़ के
लिये
गला फाड़ कर चिल्लाएं

एक दूसरे पर
थोड़ा हंसें
और थोड़ा अपनी
आत्म मुग्धता को हंसाएं
बदल जाएं
चाहे कितनी सत्ताएं
उस पर
बेधड़क बोली का
अंकुश लगाएं

चलो!
इस साल को
लोकतांत्रिक अभिव्यक्ति का
साल बनायें
नये साल में नये अंदाज़ में
मिल कर कदम बढ़ाएं।

आप सभी को नव वर्ष की हार्दिक शुभकामनाएँ।

रविवार, 30 दिसंबर 2018

सच बेचिये, खुद को नहीं!

भूपेश पंत

सार्थक पत्रकारिता के मकसद से निकलने वाली चुनिंदा पत्र-पत्रिकाओं, चैनलों या वेबसाइट्स के शुभचिंतकों में तकरीबन हर उम्र, तबके और सामाजिक परिवेश के लोग होते हैं, लेकिन उनकी चिंता आश्चर्यजनक रूप से समान है। ये लोग मानते हैं कि सच लिखना और बोलना धीरे धीरे और मुश्किल होता जा रहा है। इन हालात में भी कुछ लोग वही सच लिख बोल रहे हैं जो जन भावनाओं से जुड़ा है। लेकिन उनकी चिंता सच बोलने को लेकर नहीं सच के ज़िंदा रहने को लेकर है। इन सबका सोचना यही है कि जो लोग सच को सामने लाने की हिम्मत कर रहे हैं वो ऐसा कब तक कर पाएंगे। इन चिंताओं के पीछे दरअसल एक ही सूत्र वाक्य है कि सच सुनना और पढ़ना अच्छा तो लगता है लेकिन सच बिकता नहीं।

कुछ लोग इस परंपरागत विचार से ज़रूर आंख मूंद कर सहमत होंगे लेकिन मुझे लगता है कि सच को बेचने पर पाबंदी लगाने वाली इस सोच ने दरअसल सच को हराने का ही काम किया है। सच को अगर लिखा-पढ़ा जा सकता है, बोला-सुना जा सकता है, पसंद किया जा सकता है तो फिर सच को बेचा क्यों नहीं जा सकता। इसी सोच ने लोगों में ये धारणा बनायी है कि सच लिख-बोल कर कुछ हासिल नहीं हो सकता। कहीं संस्कारों के नाम पर ये सच के खिलाफ कोई साज़िश तो नहीं है?  वैसे भी पत्रकारिता को सदा से ही सच को सामने लाने वाले औज़ार के तौर पर देखा गया है। सच लिखने और दिखाने का दावा करने वाले मीडिया संस्थान भी तो दरअसल सच को बेचने की दुकानें ही हैं। ये कतई ज़रूरी नहीं कि सच बिकाऊ बन कर अपना अस्तित्व खो दे। लोग अगर सच जानना चाहते हैं तो उन्हें उसकी कीमत तो चुकानी ही चाहिये। सच को बिकाऊ बनाने का मकसद समाज में सच की सत्ता को स्थापित करना होना चाहिये ताकि जीवन के हर क्षेत्र में लोग सच से जुड़ने का साहस कर सकें। सच को गरीब बना कर ये काम नहीं हो सकता। लेकिन इस बात का ध्यान रखना होगा कि सच को बेचने के नाम पर उसे बाजारू ना बनने दिया जाये। सच तभी बाजारू बनेगा जब उसे लिखने और बोलने वाले खुद बिकाऊ हो जायें। दुर्भाग्य से आज हो यही रहा है। सच के नाम पर कलम बेची जा रही है। सियासत से लेकर मीडिया तक फैली कारोबारी ताकतों को भी सच की ताकत का अहसास है। सरकारें चाहती तो नहीं लेकिन मानती ज़रूर हैं कि लोगों को सच जानने का अधिकार है। सूचना का अधिकार इसी वजह से अस्तित्व में आया। सच के ही नाम पर कई चैनल और पत्र पत्रिकाएं मौजूदा दौर में झूठ की फसल उगा रही हैं। सच का मुलम्मा लगा कर उसे लोगों के सामने परोस कर खूब मुनाफा भी कमाया जा रहा है। लेकिन सच आज भी उतना ही निरीह और मजबूर है जितना पहले था। सच बोलने वाली आवाज़ें या तो सत्ता के दमन चक्र के आगे घुटने टेक देती हैं या फिर उन्हें बड़ी ही चालाकी से खामोश कर दिया जाता है। ये लोग संस्कारों के नाम पर सच को बिकाऊ नहीं बनने देते और उसी की आड़ में झूठ के कारोबार का रास्ता साफ करते हैं। बिल्कुल उसी तरह जैसे धर्म के तथाकथित ठेकेदार भगवान की आड़ में अंधविश्वास को बढ़ावा देते हैं। आधा सच तो झूठ से भी ज्यादा खतरनाक होता है क्योंकि उसकी वजह से कोई द्रोणाचार्य निहत्था करके मारा जा सकता है।

सच को ज़िंदा रखने की ज़िम्मेदारी सिर्फ सच लिखने और बोलने वालों की ही नहीं है। सच सुन कर ताली बजाने से ही काम नहीं चलेगा। सच को किसी तमाशे की तरह देखने की बजाय उसे जीवन का अभिन्न अंग बनाना होगा। सच सुनना, पढ़ना और जानना पसंद करने वालों को उसे बचाने के लिए भी आगे आना होगा। सियासत और पत्रकारिता समेत जीवन के हर पहलू में सकारात्मक बदलाव के लिये सच की प्राण प्रतिष्ठा किया जाना बहुत ज़रूरी है।
(राष्ट्रीय पत्रकारिता दिवस पर विशेष) 

बूढ़ी उम्मीदों का जवान राज्य है उत्तराखंड

भूपेश पंत

लड़ भिड़ कर पर्वतीय राज्य उत्तराखंड के लोगों ने नौ नवंबर 2000 में अलग राज्य की अपनी मांग मनवा ही ली। इस मांग को लेकर हुए जनांदोलन को चौबीस साल बीत गये और राज्य मिले अठारह साल। यूपी के पर्वतीय इलाके की उपेक्षा और योजनाओं में पहाड़ की अनदेखी के आक्रोश से जन्मा था पृथक पर्वतीय राज्य का ये जनांदोलन। हर क्षेत्र में पिछड़े इस पर्वतीय इलाके के लोगों का गुस्सा भड़काने का काम किया आरक्षण के मुद्दे ने। लोग आरक्षण के विरोधी नहीं थे लेकिन भौगोलिक आधार पर अपने पिछड़े होने के बावजूद जातीय आधार पर अवसरों में कटौती का अहसास उन्हें सड़कों पर उतार लाया और देखते देखते ये आंदोलन अलग राज्य की मांग में तब्दील हो गया।
क्या छात्र, क्या महिलाएं, क्या कर्मचारी और क्या कारोबारी, अपने अस्तित्व को बचाने की इस जद्दोजहद में हर कोई भागीदार था। राजनीतिक दलों ने आंदोलन की आंच में सियासी रोटियां सेंकनी शुरू कीं लेकिन जनता के इस आंदोलन की कमान ना तो कोई सियासी दल अपने हाथ में ले पाया और ना ही कोई नेता। तत्कालीन यूपी सरकार का दमनचक्र भी चरम पर था। खटीमा, मसूरी, नैनीताल, मुजफ्फरनगर से लेकर दिल्ली तक खून के छींटे भी उड़े और आंदोलन की तपिश भी महसूस की गयी। सड़कों पर उतरा हर व्यक्ति अलग राज्य के निर्माण में अपनी भागीदारी निभा रहा था। भागीदार वो भी थे जो अपने घरों, मोहल्लों और गांवों में पुलिसिया गिरफ्त से बच कर पहुंचे अनजाने चेहरों को छत और खाना मुहैया करा रहे थे। भागीदार वो लोग भी थे जिन्होंने आंदोलन की कामयाबी की दुआएं मांगीं।
इस जन आंदोलन ने उत्तराखंड को बहुत कुछ दिया। अपमान, पीड़ा, शहादत, उत्पीड़न और बलात्कार की नींव पर उत्तराखंड राज्य का निर्माण हुआ और साथ ही मिली आंदोलन से उपजे नेताओं की नयी फौज। ये वो लोग थे जिनमें उत्तराखंड राज्य को लेकर भावनाओं का ज्वार था, कुछ सपने थे और व्यवस्था के प्रति एक आक्रोश था। सियासत में अधपके ये लोग सियासी दलों के खांटी नेताओं के लिये बहुत बड़ा खतरा थे जो नये राज्य के निर्माण में अपने लिये नयी संभावनाएं तलाश रहे थे। यही वजह रही कि जो नेता जन आंदोलन की अगुवाई तक नहीं कर पाये वही नये राज्य की सियासत के सबसे बड़े सूबेदार बन कर अगली पंक्ति में जा खड़े हुए।
नेताओं और नौकरशाहों के चमकते चेहरे अपनी सियासी और माली हालत में सुधार की पूरी गुंजाइश देख रहे थे। खतरा था तो बस उन नौजवानों और जागरूक बुद्धिजीवियों से, जो अपने सपनों के नये राज्य में पहाड़ के सुलगते सवालों का हल तलाश रहे थे। बस यहीं से शुरू हुई आंदोलन में भागीदारी के रिटर्न गिफ्ट बांटने की सियासत। नवोदित पर्वतीय राज्य के सियासी आकाओं ने आंदोलन से जुड़े लोगों को सहूलियतों, रियायतों, प्रमाणपत्रों और नौकरियों का झुनझुना दिखाना शुरू किया। ये वो सियासी दांव था जो और किसी भी दूसरे नवोदित राज्य में इस तरह नहीं चला गया। लोगों को भी लगा कि अगर सरकार उनके त्याग और बलिदान की कीमत चुका रही है तो इसमें बुरा क्या है। आंदोलनकारियों के चिह्नीकरण के नाम पर लोगों को खेमों में बांट दिया गया।
आंदोलन के दौरान मारे गये शहीदों के नाम पर स्मारक बना कर औपचारिकता पूरी कर दी गयी। सोचा ये जाना था कि नये राज्य के पुराने मुद्दों का हल कैसे मिले, पहाड़ की दुश्वारियां कैसे दूर हों और विकास के सपनों को कैसे साकार किया जाये। लेकिन सियासी साजिश का शिकार होकर आंदोलन की कोख से जन्मे आंदोलनकारी अपनी ऊर्जा इस बात पर खर्च करने लगे कि आंदोलन में भागीदारी की ज्यादा से ज्यादा कीमत उन्हें कैसे मिले और दूसरों को कैसे नहीं। पहाड़ के वास्तविक मुद्दों को पेंशन की रकम, चिह्नीकरण में आ रही दिक्कत, सम्मान पाने की होड़ और रियायतों की झड़ी से ढक दिया गया। जुझारू लोगों को सुविधाभोगी बनाने की साजिश रची गयी।
वो आंदोलनकारी जो नये राज्य के बेहतर निर्माण में नींव के पत्थर बन सकते थे उन्हें एक ऐसे ढांचे के कंगूरे बना कर सजा दिया गया जिसकी नींव में भ्रष्टाचार, ऐय्याशी, अपराध, शराब माफिया, खनन माफिया और भू माफिया जैसी दीमकें आज भी रेंग रही हैं। सियासी दलों को अपने इस दांव से राहत भी मिली और रोजगार भी। कुछ आंदोलनकारी आज भी स्थायी राजधानी गैरसैंण समेत राज्य के तमाम अनसुलझे मुद्दों को लेकर छिटपुट लड़ाई लड़ रहे हैं लेकिन स्वार्थों की सियासत न तो उन्हें एकजुट होने दे रही है और न ही मजबूत। राज्य आंदोलनकारियों के नाम पर हो रही सियासत का ये एक ऐसा भद्दा चेहरा है जो लोगों के त्याग और कुर्बानियों को सरकारी पलड़े में तोल कर उसकी बोली लगा रहा है। हैरानी की बात तो ये है कि सियासत के इस मकड़जाल में फंसे लोग खुद आगे बढ़ चढ़ कर अपनी बोली लगा रहे हैं। जैसे कि वो आंदोलन में कूदे ही थे ये सब पाने के लिये।
बीते अठारह सालों में उत्तराखंड तो जवान हो गया लेकिन लोगों की उम्मीदें बुढ़ाती चली गयीं। राज्य में हाईकमान संस्कृति से संचालित राष्ट्रीय दलों की सरकारें विकास को उन सुदूर पहाड़ी इलाकों तक चढ़ाने में नाकाम रहीं जिनके लिये ही वास्तव में राज्य का गठन किया गया था। ये सरकारें कभी नौकरशाहों की मनमर्जी का रोना रोती नज़र आती हैं तो कभी गैरसैंण को ग्रीष्मकालीन राजधानी बनाने का मुद्दा गरमाती हैं। पलायन के कारण वीरान होते गांव हों या आपदा राहत के नाम पर बंदरबांट, शिक्षा-स्वास्थ्य और पेयजल से जुड़े मसले हों या पहाड़ से जुड़ी लोकलुभावन घोषणाएं सरकार और विपक्ष के रूप में ये राष्ट्रीय दल आपस में नूराकुश्ती ही करते नज़र आते हैं।
पहाड़ की जनता को इस मामले में प्रमुख क्षेत्रीय पार्टी उत्तराखंड क्रांति दल से भी निराश ही हाथ लगी है। पार्टी के इक्का दुक्का विधायक अपनी सुविधा से सरकारों की गोद में जा बैठते हैं और संगठन के पांव तले जैसे ज़मीन ही गायब है। गुटों में बंट कर अपनी पहचान खो चुकी यूकेडी अगर पहाड़ की जनता के मुद्दों को आक्रामकता से उठाती तो शायद उनके दिलों में कुछ जगह भी बना पाती। लेकिन खुद को बचाने की कशमकश में ही उलझी ये क्षेत्रीय पार्टी कभी इन मुद्दों की तरफ पूरे जोश के साथ लौट भी पाएगी ऐसी उम्मीद करना फिलहाल बेमानी लगता है।
पहाड़ की अस्मिता के संघर्ष में जुटे छोटे छोटे राजनीतिक और गैर राजनीतिक संगठन स्थानीय स्तर पर इन समस्याओं के लिये संघर्ष जरूर कर रहे हैं लेकिन उन्हें एक सूत्र में पिरो सके ऐसी कोई राजनीतिक शक्ति उभर पाएगी इसे लेकर भी संदेह बना हुआ है। पहाड़ के इस तरह बंटे होने का सियासी लाभ हमेशा की तरह कभी कांग्रेस तो कभी बीजेपी उठाती आयी हैं। सच तो ये है कि अपने जन्म के साथ ही उत्तराखंड शहीदों और आंदोलनकारियों के सपने का राज्य नहीं बन पाया है।
वो तो बस भ्रष्ट नेताओं, नौकरशाहों और उद्योगपतियों की चारागाह बन कर रह गया है। यानी जो जनांदोलन चौबीस साल पहले हालात में बदलाव के जिन सपनों के साथ शुरू हुआ था वो लक्ष्य अब तक अधूरा है। ये एक जनांदोलन और उससे जुड़े सपनों की मौत नहीं तो और क्या है? सच तो ये है कि पिछले अठारह सालों से हम अपनी ही उम्मीदों की लाश समारोह पूर्वक ढो रहे हैं और सरकारें हर साल इसी बात का उत्सव मनाती हैं।
 09/11/2018

शौक़!

न यहाँ का शौक़ है न ये वहाँ का शौक़ है
ये वहशत की सियासत कहाँ का शौक़ है।

क्यों खफ़ा हैं मेरे शौक़े तसव्वुर से इतना
उन्हें भी तो सुना है सारे जहाँ का शौक़ है।

पहाड़ी पर फिर से मंडरा रहा है एक बाज
ऊंचाई से शिकार पर झपटने का शौक़ है।

गिरगिट को भी इतना ये हुनर नहीं आता
नेता को जितना सूट बदलने का शौक़ है।

धोते हैं बाद क़त्ल के वो हाथ और खंजर
क़ातिलों से वाबस्ता सफ़ायी का शौक़ है।

एक के कुसूर पे पूरी क्लास ने पायी सज़ा
मास्साब को लाइन में पिटाई का शौक़ है।

उनका दावा है कि शौक पान का भी नहीं
जिन्हें ईमान की सुपारी चबाने का शौक़ है।

ज़माने के दर्द से छलनी हो चुका है सीना
ख़ुदा जाने हमें ये किस ज़माने का शौक़ है।

जो रो रहे हैं तुम्हारे आगे यों फूट फूट कर
उनकी हरेक अदा फूट डालने का शौक़ है।

हर बात पे तुम्हारी कर लेते हैं हम भरोसा
क्या सांप आस्तीन के पालने का शौक़ है।

- भूपेश पंत

और.. उल्लू बना अपना !

भूपेश पंत

इसी तरह वो भी दीवाली की एक रात थी। बच्चों के साथ मुहल्ले में ग्रीन पटाखे जला कर पर्यावरण को नुकसान न पहुंचाने की शांति से मन ओत प्रोत था। ज्यादातर पटाखे बच्चों ने मुँह से अजीब अजीब आवाज़ निकाल कर फोड़े। जिस बच्चे ने जितनी अच्छी आवाज़ का प्रदर्शन किया उसे मैंने मन ही मन पुलिस अधिकारी या नेता बनने का आशीर्वाद दिया और घर आ गया।

घर के चारों ओर रोशनी उतनी ही थी जितनी जेब के लिये मुनासिब थी। लिहाज़ा मालाओं  से ज्यादा दीयों और मोमबत्ती की रोशनी पर भरोसा किया गया था। बीबी सज संवर कर तरह तरह के पकवान और फल सजाये लक्ष्मी माता की तस्वीर के आगे बैठी थी। उसे बताया गया था कि पैसा ही पैसे को खींचता है इसलिये खून पसीने की सारी कमाई एक छोटी सी पोटली की शक्ल में सामने धरी थी। चंचल लक्ष्मी को साधने की उसकी इस मासूम सी कोशिश को माता के पांव के पास बैठे उलूक राज घूर रहे थे। बीबी की इस निस्वार्थ पूजा को देख कर मुझे अच्छे दिनों की तरह ही ये यकीन होने लगा था कि आज माता लक्ष्मी मुझ आम इंसान के घर पर जरूर पधारेंगी।

दिमाग़ में अचानक घुस आये इस वहम पर भरोसा करके मैंने घर की खिड़की खोल दी। ठंडी हवा भीतर तक काटने लगी पर सोचा क्या पता माता लक्ष्मी रात के बारह बजे दरवाज़ा खटखटाने में संकोच करें। मैंने रजाई उठा कर खिड़की के पास पड़े तख्त पर ही उनका इंतज़ार करने का फैसला किया। मेरी आँख कभी खिड़की पर जाती और कभी दीवार घड़ी पर। ये सिलसिला शायद बारह बजने से एक दो मिनट पहले तक चलता रहा। मेरे कान अच्छे दिनों की आहट सुनने को बेताब थे और मन जुमलों से खेल रहा था।




अचानक खिड़की पर किसी पक्षी के पंख फड़फड़ाने जैसी आहट हुई। मुझे एकबारगी लगा कि कहीं कोई चोर तो नहीं लेकिन जब मैंने अपने सामने रोशनी के एक पुंज को माता लक्ष्मी के वाहन उल्लू में बदलते देखा तो मेरी हैरानी की सीमा ही नहीं रही। उलूक शिरोमणि को साक्षात सामने देख कर मन भाव विभोर होने ही वाला था कि मेरे दिमाग़ ने उसे पॉज कर दिया। अरे ये तो सिर्फ गाड़ी है इसका मालिक कहां है। मतलब लक्ष्मी माता इनके ऊपर बैठी क्यों नहीं हैं ये तो पूछ।

मैंने उल्लुओं के ह्रदय सम्राट को सादर प्रणाम कर पूछा कि अच्छे दिनों की तरह माता लक्ष्मी भी आपके ऊपर से अंतर्धान क्यों हो गयीं। आपके होते हुए कहीं वो पैदल तो नहीं हो गयीं। उल्लू महाराज ने अपनी चिर परिचित घुर्रन आंखों में वात्सल्य लाने की नाकाम कोशिश करते हुए चोंच खोली। वत्स मैं तो स्वभाव से फकीर हूँ और मुझमें लक्ष्मी को लेकर कोई अनुराग या विराग नहीं है। माता मेरी सवारी करें या न करें पर उन्हें उनकी मंजिल तक मैं ही पहुंचाता हूँ। ये कह कर उल्लू शिरोमणि ने गर्व से अपनी गर्दन तीन सौ साठ डिग्री घुमा दी। उनके पास दिखाने को शायद यही एक डिग्री थी।

मैंने पूछा, महाराज निश्चित तौर पर आपने जब उड़ान भरी होगी तो माता लक्ष्मी आपके ऊपर ही सवार रही होंगी। लेकिन अब वो वहां नहीं हैं। इसलिये कृपा करके अपनी उड़ान के बाद का पूरा वृत्तांत सुनाने की कृपा करें।

उलूक महाराज अपनी वाह वाह करने की मुद्रा से बाहर निकले और बोले, वत्स माता लक्ष्मी के कई प्रतिरूप इस वक्त उस जगमगाहट का हिस्सा बन चुके हैं जहां के लिये वो बने थे।

मैंने कहा, अरे वो माता हैं कोई एनपीए नहीं कि उन्हें किसी के लिये बनाया गया हो। लगता है उन्हें मार्ग से भटकाने में आपका ही हाथ है।

उलूक महाराज ने पहले अपनी प्रकृति प्रदत्त कर्कश आवाज से मुझे मित्रवत संबोधित किया फिर बोले, तुम्हें मालूम है कि माता लक्ष्मी को लोग रोशनी में नहीं रखते इसलिये वो जब भी जगमगाहट देखती हैं उसी में खोकर रह जाती हैं। वैसे जगमगाहट तो तुम्हारे यहां भी है लेकिन कई कोने अभी भी अंधेरे में हैं। और मुझे ये अंधेरे पसंद हैं। मैं अगर माता को तुम्हारे घर में प्रेम, भाईचारा, आपसी विश्वास और ईमानदारी के दीयों की जगमगाहट दिखा देता तो वो यहीं रुक जाती। फिर वो यहां पर अशिक्षा, अज्ञानता, बीमारी, लाचारी, भुखमरी और पिछड़ेपन के अंधेरे कोनों को भी रहने नहीं देतीं। इसलिये मैंने अपनी उड़ान का वही रास्ता चुना जो बड़ी बड़ी आलीशान इमारतों से होकर जाता है। ताकि वहां की शानोशौकत माता लक्ष्मी को वहां ठहरने पर मजबूर कर दे।

तो क्या माता लक्ष्मी मेरे भाग्य में नहीं, मैं बोल पड़ा।

उलूक राज ने गंभीर होते हुए कहा, देखो वत्स। एक गोपनीय बात बताता हूँ। अव्वल तो इसे किसी से कहना नहीं क्योंकि लोगों में इतनी समझ भी नहीं। फिर भी जरूरी हुआ तो मुझे क्रेडिट देना मत भूलना। बुद्धिमान लोगों को अति बुद्धिमान नेतृत्व मिलता है जबकि मूर्खों को महामूर्ख नेतृत्व मिलता है। तुम्हारे भाग्य में जो तुमने लिखा वही तुमको मिला है, यानी मैं। माता लक्ष्मी को भूल जाओ और वही करो जो एक उल्लू के राज में तुम्हें करना चाहिए।

इतना कह कर उल्लू शिरोमणि एक बार फिर उड़ गये। मैंने पाया कि बीबी इस दीवाली की मेहनत भी बेकार जाने पर फिर से मुझे कोसने लगी थी और मैं हर बार की तरह फिर से उसे काठ के उल्लू की तरह देख रहा था। पार्श्व में कहीं कोई माता गा रही थी।

मैं क्या करूं राम मुझे उल्लू मिल गया...!

तेरा नाना मेरा नाना

गप्पू : (लोगों से घिरा हुआ) मित्रों! देखो देखो मेरे नानाजी की तस्वीर। आज मैं आपको मिलाने जा रहा हूँ अपने नानाजी से जिन्होंने इस शहर के लिये बहुत कुछ किया। उस वक्त भी जब हम लोग कुछ नहीं कर रहे थे। आज हमने अपने परिवार के खोये गौरव को फिर से पा लिया है।

(लोग वाह वाह करते हुए तालियां बजा रहे हैं)

पप्पू : अरे इतनी भीड़ क्यों लगी है। कोई तमाशे वाला आया है क्या..

गप्पू : (भीड़ के बीच से मुंडी बाहर निकाल कर) इधर आओ और ये देखो मेरे नानाजी की तस्वीर। तुम बड़ा कहते थे ना कि हमारे परिवार का इस शहर को बसाने में कोई योगदान नहीं है। देख लो मेरे नानाजी इस शहर के बसाने वालों में से एक थे।

पप्पू : (चश्मा लगा कर हैरान होते हुए)  अरे क्या गजब करते हो यार...  ये तो मेरे नानाजी के भाई हैं। अक्सर हमारे साथ ही रहते थे और मेरे पास भी इनकी तस्वीर है.. (जेब से तस्वीर निकालते हुए) ये देखो मेरे दोनों नानाजी।

गप्पू : ऐसे कैसे... अगर ये तुम्हारे नानाजी थे तो आजकल तुमने इनकी भव्य तस्वीर क्यों नहीं बनायी। तुमने इनके नाम का ढोल क्यों नहीं पीटा। ये तुम्हारी जेब से निकली पुरानी श्वेत श्याम तस्वीर इस बात का प्रमाण है कि तुम्हारे परिवार ने उनकी उपेक्षा की और वो तुम्हारे नाना नहीं थे। वो मेरे मुहल्ले के थे और मैंने उनकी इसी तस्वीर को रंगीन और बड़ा बना कर चायनीज फ्रेम में सजाया है। मैंने और सिर्फ मैंने ही उनकी तस्वीर पर इतना खर्च किया है इसलिए अब ये तस्वीर और नानाजी दोनों मेरे हुए। बजाओ ताली।

(पप्पू सिर पीट रहा है और लोग वाह वाह कर फिर से ताली बजाने लगे हैं।)

- भूपेश पंत

एक्सचेंज ऑफर

गप्पू : देखा मैं कुछ भी कर सकता हूँ क्योंकि मेरे पास बहुमत है, सबसे धनवान पार्टी है, कई राज्यों में सरकार है, भेड़ों की तरह सजी भक्तों की फौज है। तुम्हारे पास क्या है...

पप्पू : ज्यादा फेंकियो मत। मेरे पास मां है...देशप्रेम से ओतप्रोत पार्टी का इतिहास है, मेरे खानदान का नाम है... और ऐसा क्या कर दिया तुमने जो मैं नहीं कर सकता।

गप्पू : मैंने पार्टी को अपने दम पर कहां से कहां पहुंचा दिया।

पप्पू : तो कौन सा तीर मार दिया। मैंने भी तो पार्टी को कहां से कहां पहुंचा दिया।

गप्पू : अरे मैं तेरी ही पार्टी की बात कर रहा हूँ।

पप्पू : दूसरों का क्रेडिट अपने खाते में डालने की तुम्हारी आदत जाएगी नहीं।

गप्पू : तू देखता जा मैं किस किस से क्या क्या छीनता हूँ.. अपने महान नेता तक को तो बचा नहीं पाया जिन्हें मैंने मरणोपरांत अपनी पार्टी का अटूट हिस्सा बना दिया है। आने वाले वक्त में इतिहास उन्हें विशालकाय राज्यवादी पुतले और राष्ट्रवाद के प्रबल समर्थक के तौर पर याद करेगा। ऐसा करने वाला मैं पहला और शायद आखिरी व्यक्ति हूँ।

पप्पू : लेकिन बिना उनकी अनुमति के तुम ऐसा कर कैसे सकते हो जबकि वो जीवित भी नहीं ...

गप्पू : मैंने जहाँ से अनुमति लेनी थी ले ली। वैसे भी क्या उन्होंने या किसी ने भी पिछले सत्तर सालों में मुझसे अनुमति ली थी। वैसे भी मैं अपने अलावा किसी की नहीं सुनता। हां अगर तुम चाहो तो मेरे पास एक ऑफर है।

पप्पू : कैसा ऑफर..

गप्पू : एक्सचेंज ऑफर.. लौहपुरुष के बदले लौहपुरुष।

- भूपेश पंत

बुतों का समाज!

तुमने
एक बुत देखा
जो आकाश तक बड़ा था
न जाने कितने
बेशकीमती रत्नों से जड़ा था
हालाँकि
जिसका वो बुत था
उसका कद
मोहताज नहीं था इस बुत का
और
सरकारी अलंकारों का
लेकिन
जाने क्यों हुक्मरान अड़ा था
उस दिन मैंने देखा
पूरे देश में
आपराधिक खामोशी
के साथ
बुतों का समाज खड़ा था
जिनके कंधों पर
इस सबसे ऊँचे बुत के
खर्च का
बोझ पड़ा था।

- भूपेश पंत

शनिवार, 29 दिसंबर 2018

बेबस बुत!

ये कैसा वहम गोया उसके दिल में गड़ गया
बुत लगा कर ख़ुदाया मेरा कद भी बढ़ गया।

जंगल के सन्नाटे में गूंजी मीटू मीटू की चीख
सरकारी अमला दोष सारा तोते पे मढ़ गया।

मैंने तो बस दिलायी थी अच्छे दिनों की याद
मुँह बिचका के यार मेरा आगे को बढ़ गया।

एक दिन मुझे यहीं पर भक्तों से पुजवाना है
ये कह के वो मंदिर की चार सीढ़ी चढ़ गया।

सोचा न था ये दाग एक दिन तो नासूर बनेंगे
छोड़ दिया इनको तो पूरा फल ही सड़ गया।

लाया गया मजलिस में सुनाने जन की बात
वो शख़्स तो अपनी ही कहने पर अड़ गया।

कट कर धूल में मिल गयी ईमान की पतंग
पेंच उसका इस बार सियासत से लड़ गया।

उसने नहीं कही कभी अपने मन की बात
जब तक पता चला सब कुछ उजड़ गया।

खबरों में अब अपनी ही खबर नहीं होती
शायद अपना ही कोई चैनल बिगड़ गया।

बड़ा ढीठ निकला मौके पे सोता चौकीदार
मैंने उसे जगाया तो हत्थे से उखड़ गया।

- भूपेश पंत

मत आना बापू!

बापू!
तुम मत आना
फिर से
ये देखने कि
इतनी कुर्बानियों से मिली
आजादी का
क्या हाल कर दिया है
हमने
सत्तर सालों में
अपने ही लोगों की
दिमागी गुलामी के जरिये
किस तरह
सत्ता के उपभोग की
नयी इबारत
लिखी है
माना कि
हम नतमस्तक हैं
तुम्हारी तस्वीर के आगे
लेकिन
जब आकर देखोगे
समता मूलक समाज
का सपना
तो हम
अपना पुश्तैनी हक
सुई की नोक बराबर भी
किसी वंचित मेहनतकश से
बाँट नहीं पायेंगे
इसलिए
तुम्हारा दोबारा आना है
वर्तमान के लिये अप्रासंगिक
और
भविष्य के लिये
अराजकता का पैगाम
लिहाज़ा
अतीत जीवियों को
उनके हाल पर छोड़ देना
बेहतर होगा
इसलिये
हमारे बुलाने पर भी
मत आना
बदले में
हम अपने कर्मों से
तुम्हारी प्रासंगिकता
बनाये रखेंगे।

बापू!
आज तुम ज़िंदा होते
तो सबसे बड़े रामभक्त होते
चरखा चलाते, रामधुन गाते
तुम देखते कि
सीना छलनी होने के बाद
मुँह से निकली हे राम की ध्वनि
अब नये रूप में सत्ता की प्रतिध्वनि
बन चुकी है
हत्यारा अब राष्ट्रभक्त है
और
तुम केवल राष्ट्रपिता
तुम्हारे
राम राज्य के सपने
को अपने लोकतांत्रिक साम्राज्य
में
साकार करने के लिये
जोशीले राम भक्तों को
जन्म दिया है
हमने
जो
अहिंसा पर विश्वास नहीं करते
वो तुम्हारा आना
सह नहीं पाएंगे
इस बार भी
तुम्हारी अहिंसा की
लाठी से
बना लिये हैं
कई सत्ता पोषित डंडे
सिर भी बढ़ गये हैं अब
घुसपैठियों और बुद्धिजीवियों के
हमारी मुश्किल और बढ़ाने
मत आना।

बापू!
आज खुश तो
बहुत होते तुम
देख कर
कि तुम्हारा सफाई का संदेश
स्वच्छता के
नये मापदंड बना रहा है
हमने
तन मन और धन
तीनों को साफ करने की
योजना बना ली है
गंदगी अब दिखायी नहीं देती
होने के बाद भी
हमने गंदे नोट तक बदल दिये
हां लेकिन
तुम अब भी हो वहाँ
निश्छल मुस्कुराहट के साथ
तुम्हारे अपनों ने
इसी फोटो फ्रेम को
हर दफ्तर में लगा कर
भ्रष्टाचार को
गांधीवादी चेहरा दिया था
हमने ये स्वदेशी तस्वीर अब
निजी और विदेशी
कंपनियों की मदद से
चमका दी है
देश के चुनिंदा पूंजीपतियों को
अपने गांधीवाद का झंडा फहराने
विदेश तक भेज दिया है
नदियों का पानी
बैंकों की तिजोरियां
और
गरीब गुरबों के घरों के कोने तक
हमने साफ कर दिये हैं
आंकड़ों में
भरपूर
शौचालय दिये हैं
ये कहने में
हमें कोई संकोच नहीं
कि इस स्वच्छता की प्रेरणा
हमें
तुम्हारी तस्वीर से ही मिली।

बापू!
तुम सच की
कड़वाहट
और
हम सत्ता के
मोदक
तुम पथ के प्रदर्शक
तो
हम सफलता की मीनार
तुम सत्य के आग्रही
और
हम उसे रोज गढ़ने वाले
हमारा इंद्रजाल
अंतर्जाल के सहारे
सच को ही देशद्रोही
साबित करने में
जुटा है
तुम्हारा फिर से आना
सड़क पर
ले आयेगा हमें
इसी डर से
तुम्हारी आत्मा की शांति के लिये
रख दिये हैं कई रास्तों के
नाम
ताकि हम खादी पहन
छल सकें
और
गर्व से चल सकें
तुम्हारे पथ पर
बिना अपने किसी नुकसान के
हमने अपने इर्दगिर्द
बिखेर दी हैं तुम्हारी मुस्कुराती
तस्वीरें अनगिनत
कुछ सहेजने के लिये
तो कुछ
कुचले जाने के लिये
हम
तुम्हारे पुतलों पर हार
तब तक
चढ़ाते रहेंगे
जब तक तुम्हारे
फिर से
पैदा होने का डर
खत्म ना हो
जाये
या फिर ये दुनिया!

- भूपेश पंत

चौकीदार-3

(लघुकथा)

कम्बख्त आज फिर सुबह सुबह टकरा गया। मूड ठीक लग रहा था। हाथ माथे तक ले जा के बोला, साहब मेरी किसी बात का बुरा मत मानना लेकिन क्या करूं कभी कभी दिमाग घूम जाता है। वो क्या है न साहब ये देश की चौकीदारी के चक्कर में हमारा पेशा खामखां बदनाम हो रहा है। हमारे साथ के भी कई चौकीदार चोरों की मदद करते हैं और मोटा माल कमाते हैं। मैं भले ही उन्हें पसंद नहीं करता लेकिन उनमें एक खास बात ये है कि चोरों को चुनने में वो कोई भेदभाव नहीं करते। ऐसा नहीं करते कि ये चोर मेरे गाँव घर का है तो उसी के लिये काम करेंगे किसी और के लिये नहीं। जात बिरादरी नहीं देखते वो। मैंने महसूस किया कि अपने साथी चौकीदारों और चोरों की जुगलबंदी की इस खास बात को वो बड़े ही गर्व से बता रहा था। पता नहीं क्यों?

- भूपेश पंत

चौकीदार-2

 (लघुकथा)

बाज़ार जाने के लिये जैसे ही घर से निकला निगाह मेन गेट के पास ज़मीन पर बैठे चौकीदार पर गयी। माथे पर हाथ लगाये जैसे वो कुछ सोच रहा था। मैंने भी उसे नहीं टोका और कार की तरफ़ बढ़ गया। लेकिन उस नामुराद ने मुझे देखते ही सिर को झटका और छलांग मारता सामने खड़ा हो गया। मैंने उसके चेहरे पर सूचना, सवाल और सलाह तीनों एक साथ देखे। वो एक सांस में बोला, साहब जी ये जो हैं बड़े वाले, उन्होंने अपने सारे नाम च से ही रखे हैं। चाय वाला और चौकीदार। च से यही नाम मिले थे क्या? ये कोई ऐसा नाम क्यों नहीं ढूंढ लेते जिससे किसी को भी कोई दिक्कत महसूस न हो। मेरी नाराज़गी भांप कर उसने जाते जाते सफाई दी, साहब बहुत नाम होते हैं बाकी जैसी जिसकी सोच। मेरा इशारा किसी गलत शब्द की ओर नहीं है और न ही मैं अपनी पोस्ट तक पर किसी को गाली देने और मारपीट का समर्थन करता हूँ लेकिन बस वो चुनाव से पहले कोई नया नाम ढूँढ लें। बड़ी किरपा होगी।

- भूपेश पंत

चौकीदार-1

(लघुकथा) 
आज सुबह कॉलोनी के चौकीदार का उतरा सा चेहरा देखा तो पूछ ही लिया। लाठी टिका कर सलाम करने के बाद मुंह बना कर बोला, साहब बड़ा खराब लगता है। चौकीदारों की तो जैसे कोई इज्ज़त ही नहीं रह गयी है। कुछ आप जैसे भले लोग हैं लेकिन बाकी सब आते जाते ऐसे घूर कर देखते हैं जैसे हमने ही कोई चोरी या नोटबंदी की हो। अब भला सूट बूट वाले चौकीदार से हमारा क्या मुकाबला। जिसे देखो चौकीदार को गरिया रहा है। हम तो साहब ईमानदारी से दिन रात की ड्यूटी करते हैं पेट पालने के लिये। अब तो ये डर सताने लगा है कि किसी और की खुंदक में कोई हमें ही ना पीट दे। आप कुछ करो ना साहब। 

(भूपेश पंत)

भागते रहो!

(कार्टून/कविता)

वो
दिन रात
काम करता है
पूंजीपतियों के लिये
भेष बदल बदल कर
देश विदेश की गलियों में
उस चौकीदार की लाठी
की आवाज़ लगातार
गूंजती है
उनके कानों में
जैसे कह रही
हो
भागते रहो।

- भूपेश पंत