शुक्रवार, 28 दिसंबर 2018

ग़ुम राह !

भूपेश पंत

एक था अच्छाई का रास्ता। एक वक़्त था जब ये रास्ता गुलज़ार रहा करता था। सुबह से शाम तक लोगों की चहलकदमी से। कोई रास्ते की मज़ार पर चादर चढ़ाने जाता तो कोई भगवान की चौखट पर माथा टेकने। एक प्राइमरी स्कूल भी इसी रास्ते पर था। चहकते बच्चों का कलरव माहौल में हंसी और खुशी घोल देता था। लेकिन अब इस रास्ते की सूरत और किस्मत दोनों बदल चुकी हैं। लोगों की आमद बहुत कम हो चुकी है।  हालांकि कुछ पुराने लोग अब भी कभी कभार इस रास्ते पर उग आये झाड़ झंखाड़ के बीच रास्ता बना कर मंदिर और मज़ार तक हो ही आते हैं। लेकिन वो बात अब रही नहीं।स्कूल की जीर्ण शीर्ण हालत ने बच्चों के मन से पढ़ाई की ललक छीन ली है लिहाज़ा वो अब बंद है। रास्ते के किनारे फैल चुकी बेतरतीब झाड़ियों ने अच्छाई के इस रास्ते को घेर कर संकरा और चुनौतीपूर्ण बना दिया है।

दोराहे पर इसी रास्ते को अलग ही दिशा में ले जाने वाला एक और रास्ता है, बुराई का रास्ता। बीते कुछ सालों में ही ये रास्ता पगडंडी से राजमार्ग बनने का सफ़र तय कर चुका है। इस रास्ते पर एक शराब का ठेका खुल चुका है। आगे बढ़ कर एक श्मशान और कब्रिस्तान तो काफ़ी समय से हैं। कभी लोग इस पगडंडी की दिशा में जाने से भी कतराते थे। मजबूरी में यहां की झाड़ियां दिशा मैदान के ही काम आती थीं। लेकिन अब ये रास्ता अपने पूरे शबाब पर है। शराब के ठेके और आसपास के ढाबों में अलमस्त  भीड़ अक्सर रहती है। ऊपर से लोग अब मरने भी ज़्यादा लगे हैं। यानी सुबह को मौत का जुलूस और शाम को मौत का जश्न इस रास्ते की सबसे बड़ी खासियत है।

"और भाई अच्छाई, तुझ पर क्यों मुर्दानी सी छाई," बुराई के रास्ते ने अकड़ते हुए शायराना अंदाज़ में बदहाल पड़े अच्छाई के रास्ते से पूछा।

"क्या कहूं भाई, अच्छाई के क़द्रदान ही नहीं रहे। सब समय का फ़ेर है।" सुबकते हुए अच्छाई के रास्ते ने जवाब दिया।

बुराई के रास्ते ने उलाहना दी, "और चलो नेकी और भाईचारे की राह, देख लिया नतीजा। अरे ये लोग बेवकूफ़ी की हद तक भावुक हैं और आँख मूंद कर बात मान लेते हैं। बस इन्हें बरगलाने का तरीका आना चाहिये। मुझे देखो, मैंने भी तो यही किया।"

"मैंने तो जीवन भर लोगों को अच्छाई से जोड़ कर रखने की कोशिश की। बच्चों को शिक्षा से जोड़ा, लोगों को मज़हबी दोस्ती का पैगाम दिया और फिर अचानक ऐसा क्या हो गया कि लोगों ने मुझ पर चलना छोड़ दिया और तुम्हारी तरफ मुड़ गये।" अच्छाई के रास्ते ने बुराई के रास्ते से पूछ ही लिया।

बुराई के रास्ते का चेहरा आत्ममुग्धता से भरा हुआ था। विद्रूप सी हंसी के साथ वो फुसफुसाया,  "तुम तो धर्म की राह पर चलने वालों का इंतज़ार करते रह गये लेकिन मैंने खुद एक धर्म गढ़ लिया, नफ़रत का धर्म। मैंने लोगों को इसके जहर से मदहोश कर दिया। लोग आपस में लड़ने लगे और मेरे रास्ते पर श्मशान और कब्रिस्तान की भीड़ बढ़ने लगी। बेवकूफ़ों को ये नशा रास आने लगा। और फिर आज के दौर में सेल्फ मार्केटिंग कितनी ज़रूरी है और उसके लिये मीडिया का किस तरह इस्तेमाल करना है ये तुम क्या जानो। मैंने अपने ऊपर एक बड़ा सा बोर्ड लगा लिया, 'धर्म और मोक्ष का रास्ता' और फिर उसकी फोटो को सोशल मीडिया पर अपलोड कर दिया।"

बातचीत के दौरान रात गहरा चुकी थी और अच्छाई का रास्ता नयी सुबह के इंतज़ार में नींद के आगोश में जा चुका था। बुराई कुटिलता से मुस्कुरायी और राजपथ पर पसर गयी।

सच में!

जीत कर जो लोग संसार जाते हैं
वो कई पीढ़ियों को देश की तार जाते हैं।
भीड़ के मज़हबी उन्माद के आगे
कुछ वो हार जाते हैं कुछ हम हार जाते हैं।
ये शख्स अकेला क़ातिल नहीं होगा
जाना होगा वहां तक जहाँ ये तार जाते हैं।
नफ़रत की यही सीढ़ियाँ चढ़ कर
कुछ इस पार आते हैं, कुछ उस पार जाते हैं।
मत छेड़ तू इन भेड़ों की भीड़ को
ये अपने खुरों से अक़लियतों को मार जाते हैं।
चलो बना लेते हैं मचान यहीं पर
हर रोज यहां से, ग़रीबों के मददगार जाते हैं।
गढ़ ली गयी है अब इंसान की मूरत
अजायबघर में देखने चलो एक बार जाते हैं।
शहीदों की चिताओं पर ये तो देखो
वो काट कर उंगली बजरिये तलवार जाते हैं।
उसने रच लिया है तिलिस्म ऐसा
फूल बरसते हैं, जहां से भी सरकार जाते हैं।
ज़म्हूरियत का मजा बहल जाने में है
सोचने वाले तो इस दर से भी लाचार जाते हैं।

- भूपेश पंत

जिसे देश से प्यार है...

ज़िंदगी को ज़िंदगी की दरक़ार है
आँखों में आंसू हैं और चीत्कार है
मत उलझ इन मज़हबी बहसों में
कह भी दे कि तुझे देश से प्यार है।

गिरा डाल नफ़रतों की यह दीवार
फेंक दे हैवानियत के हर हथियार
तेरा धर्म इंसानियत की पुकार है
कह भी दे कि तुझे देश से प्यार है।

बांटने वालों पर तू ना ध्यान धर
तू इनके मंसूबों की पहचान कर
यही वक्त की सबसे बड़ी हुंकार है
कह भी दे कि तुझे देश से प्यार है।

सत्ता है क्या सब कुर्सी का खेल है
सच पर फंदा झूठ की रेलमपेल है
इनके झांसे में आने से इनकार है
कह भी दे कि तुझे देश से प्यार है।

उड़ रहे जो ये विकास के परिंदे हैं
आंकड़े नहीं हैं ये झूठ के पुलिंदे हैं
जिनमें टूटते सपनों की झनकार है
कह भी दे कि तुझे देश से प्यार है।

अन्नदाता ही जहां अन्न नहीं खाता
मर के भी जो कर्ज़ चुका नहीं पाता
तेरा जीवन उसका भी कर्ज़दार है
कह भी दे कि तुझे देश से प्यार है।

जो सीमा पर अपनी जां लुटाते हैं
तेरे लिये तिरंगा लपेट कर आते हैं
उन पर भी सियासत, धिक्कार है
कह भी दे कि तुझे देश से प्यार है।

अदालत के डंडे से ही चल रही है
अच्छे दिनों की आस, छल रही है
इसके लिये तो तू भी ज़िम्मेदार है
कह भी दे कि तुझे देश से प्यार है।

सरहदों से केवल बनता देश नहीं
लोग नहीं फिर कुछ भी शेष नहीं
आपस में ही क्यों मची तकरार है
कह भी दे कि तुझे देश से प्यार है।

जो बन बैठी है धूर्त, अहंकारी है
वही व्यवस्था है वही सरकारी है
तेरी नादानी का तुझही पर भार है
कह भी दे कि तुझे देश से प्यार है।

हां मुझे देश से प्यार है।

- भूपेश पंत

एक दिमाग़ की मौत!

(ब्रेन डेड सोसायटी)
भूपेश पंत

कहते हैं कि भीड़ का अपना दिमाग नहीं होता लेकिन ये भी सच है कि हर तरह की भीड़ के पीछे कोई न कोई दिमाग़ ज़रूर होता है। वो दिमाग़ कैसा और किसका होगा ये जानने की उत्सुकता एक रात मुझे आधी रात को शहर के उस अंधेरे कोने में ले आयी। अंधेरे को चीरती उल्लू की आवाज़ और फड़फड़ाते चमगादड़ों के बीच खँडहर में काले लिबास पहनी भीड़ जमा थी। इस तरह चीखती चिल्लाती मानो मौत का समारोह मन रहा हो। मैंने देखा कि भीड़ का दिमाग़ और चेहरा दोनों ही नहीं थे। मुझे देखते ही भीड़ ने मुझे किसी शिकार की तरह घेर लिया। मुझसे मेरी पहचान पूछी गयी और पूरी तसल्ली के लिये कई ऐसे फेसबुकिये कुतर्क किये गये ताकि जाना जा सके कि कहीं मैं दिमाग़ का इस्तेमाल तो नहीं करता हूँ। लेकिन मैं जानता था कि मेरी जरा सी भी होशियारी भीड़ को मुझ पर टूट पड़ने का मौका दे देगी। लिहाज़ा मेैंने उनके हर कुतर्क पर मौन साध लिया और भीड़ का हिस्सा बन गया। मुझे पता था कि शहर के किसी काले अंधेरे हिस्से में इस भीड़ को चलाने वाला कोई दिमाग़ और चेहरा ज़रूर होगा जिसे देखने को मैं उत्सुक था। भीड़ का उन्माद पूरे शहर पर पसरता गया। भीड़ भी बढ़ती गयी और मरने वाले भी। एक दिन ऐसा आया जब भीड़ का उन्माद अर्श पर था लेकिन उसका शिकार होने वाला कोई बचा नहीं। भीड़ लाशों के बीच किसी ज़िंदा शिकार को ढूँढ रही थी कि कहीं से आवाज़ आयी कि चलो अब बहुत हो गया, खत्म करो। मुझे भी लगा कि चलो ये भीड़ छटे तो वो चेहरा और दिमाग़ साफ दिखने लगेगा जो अभी नेपथ्य में गुम है। मैं बेसाख्ता बोल पड़ा कि हां, यही ठीक रहेगा। मेरी आवाज़ निकलते ही भीड़ ने मुझे घेर लिया और फिर मुझ पर टूट पड़ी। मौत को इस तरह अपनी ओर आते देख मुझे अहसास हो गया कि मैंने खुद को शैतानों के बाड़े में फैंक दिया है। भीड़ ये जान चुकी थी कि उनमें और मुझ में समझ का फ़र्क है। अपनी आख़िरी सांसें गिनते हुए अचानक मेरी अधखुली आंखों के सामने एक चेहरा नमूदार हुआ। वो चेहरा था सत्ता का। नफ़रत के दागों से भरा उसी की तरह सपाट और संवेदनहीन। और फिर जो मैंने देखा वो हैरान करने वाला था। सत्ता के बड़े बड़े नाखूनों वाले दोनों पंजों के बीच भीड़ में शामिल हर शख्स का दिमाग़ था लेकिन मेरा नहीं। शायद यही वजह थी मेरे मारे जाने की।

मुखौटा!

चुनावी जलसों में वही थे जहां भी हम गये
सबसे बड़े थे जो वो चेहरे मुखौटा बन गये।
एक टीस सी उठती है अब तो इस मन में
ओ हिंद की संतानो क्या थे, क्या बन गये।
जिन्हें इल्म था वो चिल्ला कर बोलने लगे
मंज़ूर था सब उन्हें तभी होंठों को सी गये।
मैं उनसे यूं ही शक्कर की तरै मिलता रहा
वो जाने कब मुझे चाय में घोल के पी गये।
जाहिलो अब कुछ अपने वजूद की सोचो
उन्हें मत कोसो जो अपना जीवन जी गये।
शेर उस रोज जब निकल आया पिंजरे से
शहर के कुत्ते सारे अपनी अपनी गली गये।
सोच कर किया था क़ातिल ने भी इंतज़ाम
मालूम था जैसे ही उससे नज़र मिली, गये।
- भूपेश पंत

सियासी दावत और पहाड़ी आम!


भूपेश पंत

पहाड़ों के आसमान पर इस साल फिर काले काले बादल घिर आए हैं. इसके साथ ही पहाड़ों के बाशिंदों के चेहरों पर भी आपदा की आशंका का खौफ पसर गया है. दुर्गम पहाड़ी रास्तों में ठूंस ठूंस कर भरे गए बसों के मुसाफिर मंजिल तक सुरक्षित पहुंचने की जद्दोजहद में लगातार जाप कर रहे हैं. मौसम के खराब सिस्टम ने पहाड़ की लोक संस्कृति को बचाने की राह में अड़ंगा डाल दिया है. उधर इन सबके बीच पहाड़ों के आम रागदरबारी गाते हुए अस्थाई राजधानी की ओर पलायन कर गए हैं. क्यों नहीं, आखिर दिग्गजों के दरबार से बुलावा जो आया है. इस दरबार में आम की बेहद खास जगह है. यहां बड़े-बड़े खास लोग जमा होकर आम चूसेंगे. आखिर आम की नियति भी यही है. जो आम पहाड़ में बच गए हैं वह बाकी जिंदगी अपनी किस्मत को कोसते हुए निकाल देंगे. यह तो पहाड़ से नीचे उतरे इन आमों का सौभाग्य है कि सियासी हाथों के चंगुल में फंस कर उनकी मौत एक खिलखिलाता समारोह बन जाएगी. इन आमों के बीच में बैठकर दावत उड़ाने वाले लोग खुद के खास होने का एहसास भी पूरे लुत्फ के साथ कर पाएंगे.
फलों के राजा होने के घमंड में फूले यह आम जब लोकतंत्र के असली राजाओं के दरबार में पेश होंगे तो उनसे यह नहीं पूछा जाएगा कि बोल तेरे साथ क्या सुलूक किया जाए. बस हाथ में लेकर चूस लिया जाएगा और थोड़ी ही देर में यह आम गुठली में तब्दील होकर मुआवजे के इंतजार में किसी कोने में पड़े होंगे. जितनी ज्यादा गुठलियां उतना ही बड़ा जश्न. अपने अपने समय के हाकिम यह बखूबी जानते हैं कि सियासत में आम के आम और गुठलियों के दाम की कितनी अहमियत है. सियासत में यह भी जरूरी है कि जब राजधानी में आम की दावत उड़ाई जा रही हो तो पहाड़ की जनता अपनी समस्याओं के पेड़ गिनने में व्यस्त रहे. दरअसल यही लोकतंत्र का असली पर्व है जहां राजनीति के दोनों छोर मिल जुलकर आम का भोग करने के लिए एक और पार्टी का गठन करते हैं. मूर्खो इसे ही सियासी जुबान में आम पार्टी कहते हैं.
Posted by: News Trust of India 09/07/2018

और लगाओ दरबार !


भूपेश पंत

जनता की समस्याओं को सुनने के लिये राजा ने दरबार लगाने की मुनादी क्या करवाई, अनपढ़, गंवार और लाचार लोगों ने तो जैसे लोकतंत्र की स्थापना का जश्न ही मनाना शुरू कर दिया। वो ये भूल गयी कि राजा आज भी राजा ही है। समय समय पर लोगों के लिये दरबार लगाना दरअसल उसकी इसी प्रभुसत्ता को सार्वजनिक रूप से स्थापित करने की सतत प्रक्रिया है। राजा अगर खुश हुआ तो फ़रियादी पर ईनामों की झड़ी लगा दे और अगर कोई उसकी सत्ता को चुनौती देने का दुस्साहस करे तो भरे दरबार में उसका सिर भी कलम करा सकता है। इससे पूरे राज्य को ये संदेश और बेहतर तरीके से जाता है कि राजा से बगावत करने वालों का यही अंजाम होगा।
राज्य के विकास की बाट जोह रही प्रजा को इतनी समझ कहां कि वो अपनी लक्ष्मण रेखा के भीतर रह सके। वो तो राजतंत्र के भीतर लोकतंत्र के प्रस्फुटित होने का जश्न मनाने में जुटी है। इस जोश में कोई लाचार फ़रियादी अपनी मर्यादा ही भूल जाये तो इसमें राजा का क्या दोष। आखिर वो राजा है जो कभी भी गुस्से में आ सकता है क्योंकि उसके लिये मर्यादा की सीमा रेखा वही है जो उसने अपने लिये तय की है। लेकिन फ़रियादी को ये नहीं भूलना चाहिये कि वो राजा के दरबार में जा रहा है और वहां के कुछ नियम कायदे होते हैं। फ़रियादी कितना भी क्षुब्ध क्यों ना हो उसे राजा के सामने तेज आवाज में बात करने की इजाज़त नहीं है। रीढ़ की हड्डी को दोहरा किये बिना राजा से आंखें मिला कर बात करना बग़ावत की श्रेणी में आता है।
राजा फ़रियादी की समस्या का समाधान करने का आश्वासन दे या न दे, उसे झुक कर और मुस्कराते हुए उल्टे पाँव राजा को इस तरह दुआएं देते हुए जाना होगा कि राजा के दर्शन कर पाना ही उसके लिये सौभाग्य की बात है। राज्य के अधिकारियों के भ्रष्टाचार की कोई शिकायत सहन नहीं की जायेगी और इसे सामने लाने वाले किसी भी मामले में राजा जीरो टॉलरेंस अपनाते हुए तत्काल फ़रियादी की गिरफ़्तारी का हुक्म दे सकता है। जो फ़रियादी किसी वजह से दरबार में अपनी बात ना कह पाये उसे राजा की मुस्कुराहट को ही सत्ता का आशीर्वाद समझ कर धन्य हो लेना चाहिए। और खबरदार जो किसी फ़रियादी ने दरबार में अपनी जान लेने की कोशिश भी की तो, क्योंकि प्रजा की जान पर राजा का हक है और उसे निकालने के लिये उसकी अपनी व्यवस्था है। फ़रियादी के इस दुस्साहस को राजा के इस सिस्टम के नाकारेपन के तौर पर लिया जा सकता है लिहाजा ये राजद्रोह माना जाएगा।
गार्ड ऑफ ऑनर दे दे कर जिन जनसेवकों को मौन साधे जन प्रतिनिधि और जननायक बनाए जा रहे हो और लोकतंत्र को दरबार तंत्र बनाने पर तुले हो तो फिर झेलो ना दरबार के नियम कायदे भी। बात करते हैं….।
Posted by: News Trust of India 30/06/2018

लोकतंत्र हमारा, मीडिया तुम्हारा!


भूपेश पंत

देश में अगले आम चुनाव के लिये सियासी ऊंट करवटें लेने की तैयारी कर रहा है और लोकतंत्र के चौथे खंभे यानी मीडिया ने हर दल का अपने अपने तरीके से सियासी मूल्यांकन करना भी शुरू कर दिया है। उनकी गिद्ध दृष्टि केंद्र और विपक्ष के सियासी नफा नुकसान के लिहाज़ से ज़मीन पर रेंग रहे मुद्दों पर झपट्टा मारने के लिये बेताब है। लेकिन मुझे कोई ये बताये कि ये कैसा लोकतंत्र है जहां किसी संभावित गठबंधन की आलोचना मीडिया के एक हिस्से में इस बात के लिये हो रही है कि उसका नेता अभी तय क्यों नहीं है। भारतीय लोकतंत्र किसी भी राजनीतिक पद के लिये सबको समान अवसर की भावना को स्थापित करता है लेकिन सच तो ये है कि देश की ज्यादातर पार्टियों का आंतरिक लोकतंत्र इस भावना से कोसों दूर नजर आता है। कहीं पार्टी के उच्च पदों पर एक ही परिवार का कब्जा है तो कहीं एक परिवार से जुड़े व्यक्ति पर ही पूरी पार्टी की चुनावी नैया पार लगाने का दारोमदार है।
ऐसे में राजनीतिक पार्टियों की इस लोकतंत्र विरोधी मानसिकता का समान रूप से विरोध करने की बजाय जब मीडिया का एक तबका सियासी हाथों में खेलते हुए एक लोकतांत्रिक प्रक्रिया पर ही सवाल उठाने लगता है तो हैरानी होती है। आखिर क्यों आज ही ये तय हो जाना चाहिये कि अमुक गठबंधन के जीतने पर कौन किस पद पर आसीन होगा। मीडिया को ये जानने में क्यों दिलचस्पी है कि भानुमती के कुनबे की भानुमती कौन होगी। आखिर इसके जरिये देश के मतदाताओं को मीडिया का ये तबका कौन सा संदेश देने की कोशिश कर रहा है। क्या वो अपनी टीआरपी बढ़ाने के लिये चुनाव से पहले किसी मुद्दे को स्थापित करने की फिराक में हैं भले ही इसके लिये लोकतांत्रिक व्यवस्था को ताक पर क्यों ना रखा जाये या फिर किसी के सियासी फायदे के लिये खुद को हथियार बनाने की कोशिश है। नफा नुकसान के भंवर में फंसे मीडिया का ये तबका शायद कामयाबी के शॉर्टकट का सफ़र तय कर रहा है लेकिन ऐसा करके क्या वो कहीं ना कहीं देश की लोकतांत्रिक व्यवस्था को खोखला नहीं कर रहा है।
कोई भी सियासी दल किसी भी चुनाव में अपने विरोधियों पर तरह तरह के राजनीतिक आरोप लगाता है जो कभी साबित नहीं होते। सियासी जंग में जुमलों का इस्तेमाल भी अब कोई नयी बात तो नहीं है। लेकिन चुनावी राजनीति में कोई भी दल अपनी संवैधानिक और लोकतांत्रिक मर्यादा को पार ना करे ये तय करने की जिम्मेदारी मीडिया की भी है। ऐसे में अगर मीडिया का कोई हिस्सा जाने अनजाने इस लोकतंत्र विरोधी सियासी मुद्दे को चटखारे ले लेकर आगे बढ़ाता है तो वो पत्रकारिता के ही नहीं लोकतांत्रिक मूल्यों के पतन में भी बराबर का हिस्सेदार है।
मेरा मानना है कि निष्पक्ष होना बेहद मुश्किल है। इस प्रक्रिया में अकसर खून के आंसू रोने पड़ते हैं और जहर के घूँट पीने पड़ते हैं। कभी कभी तो अंतरात्मा की आवाज़ को भी अनसुना करना पड़ता है। ज़ाहिर है ऐसे में निष्पक्षता का दावा करने वाले तथाकथित मीडिया को किस दर्द से गुजरना पड़ता होगा ये मैं कुछ हद तक समझ सकता हूँ। लेकिन इस दर्द से आराम पाना चाहें तो वो इस देश के संविधान, लोकतांत्रिक सिद्धांतों, जनता के हितों और सच के पक्ष में खड़े होकर पा सकते हैं। वर्ना हो सकता है उनकी वजह से पूरी मीडिया बिरादरी ही आने वाले समय में ये विकल्प पूरी तरह से खो दे।
Posted by: News Trust of India 22/06/2018

पिक्चर अभी बाकी है….!




भूपेश पंत

अगले साल होने वाले आम चुनाव के लिए बीजेपी की ओर से बिसात बिछनी शुरू हो गई है। मेरा मानना है कि जम्मू कश्मीर में सरकार को गिराने का यह फैसला दोनों दलों की नूरा कुश्ती से अधिक कुछ नहीं है और इससे होने वाला राजनीतिक ध्रुवीकरण अगले आम चुनाव और जम्मू कश्मीर के विधानसभा चुनाव में दोनों दलों के लिए काफी अहम साबित होगा।
बीजेपी की साफ मंशा अगले 1 साल में राज्यपाल शासन के दौरान आतंकवाद और इसके जरिए राष्ट्रवाद को मुद्दा बनाकर अगला आम चुनाव लड़ने की है। राज्य में हालात इतने बिगड़ चुके हैं कि कोई भी दूसरा राजनीतिक दल नई गठबंधन सरकार के गठन के जरिए राज्य में लोकतांत्रिक व्यवस्था को बनाए रखने और उससे होने वाले राजनीतिक नुकसान का जोखिम नहीं लेना चाहता। लिहाजा जम्मू कश्मीर में हर राजनीतिक दल इस वक्त गवर्नर के शासन को एक मात्र विकल्प मान रहा है। बीजेपी भी यही चाहती थी कि गवर्नर के शासन के जरिए राज्य की कमान केंद्र के हाथों में आ जाए। बीजेपी ने जिस तरह महबूबा मुफ्ती की पीडीपी के साथ इस तलाक को अंजाम दिया उसकी नाटकीयता पर्दे के पीछे के किसी खेल को उजागर करने की हिमायत जरूर करती है।
फैसले के वक्त को देखें तो जम्मू कश्मीर की आवाम के लोकतांत्रिक हितों को ताक पर रख कर लिया गया यह फैसला राजनीतिक महत्वाकांक्षाओं से प्रेरित लगता है। क्या कारण है कि रमजान में सीजफायर के जिस फैसले को इसकी एक अहम वजह बताया जा रहा है उसे लेने से पहले ही सरकार से अलग होने का फैसला नहीं लिया गया। सोशल मीडिया में सरकार के इस फैसले की काफी आलोचना हो रही थी। लेकिन अगर यह फैसला तब ले लिया गया होता तो बीजेपी पर पूरी तरह से मुस्लिम विरोध का ठप्पा लग जाता। उसने जहां एक और इस एक महीने के मौके को बढ़ती पत्थरबाजी और आतंकवादी घटनाओं के जरिए अपने वोट बैंक में राष्ट्रवाद को उत्प्रेरित करने के लिए इस्तेमाल किया वही मुस्लिम वोट बैंक को भी लुभाने की कोशिश की।
इस एक महीने के अंतराल ने दोनों दलों को यह मानने के लिये तैयार कर दिया कि इस वक्त साथ छोड़ना सियासी तौर पर सबसे मुफीद होगा। यही वजह है कि इस फैसले के बाद बीजेपी ने सरकार में शामिल रहने के बावजूद इसका ठीकरा पीडीपी पर फोड़ा तो दूसरी ओर महबूबा मुफ्ती ने भी धारा 370 को बरकरार रखने समेत अपनी पार्टी की सरकार की उपलब्धियां गिनाने में देर नहीं की।
जाहिर है बीजेपी को लगता है कि जम्मू कश्मीर के मौजूदा और आने वाले घटनाक्रमों का लाभ अगले आम चुनाव में पूरे देश में उसे मिल सकता है जबकि पीडीपी खुद को सीजफायर और जम्मू कश्मीर की आवाम की हिमायती बताते हुए अगले आम चुनाव में बहुमत की अपील के साथ इसका राजनीतिक फायदा उठाने की कोशिश करेगी। यानी इस एक राजनीतिक दांव से दोनों ही दलों ने अपने पाप धोने की कोशिश की है। सियासी शतरंज पर इस बिसात को उसी दिन बिछा दिया गया था जब यह बेमेल गठबंधन सामने आया था। आज इस नाटक का अंत हो गया। लेकिन पर्दा अभी गिरा नहीं है… पिक्चर अभी बाकी है मेरे दोस्त।
Posted by: News Trust of India 19/06/2018

चौकीदार!

चौकीदार ने कहा चौकीदार क्यों हो
लुटे घर के तुम, पहरेदार क्यों हो।
पांच साल पर जिसे ले लिया मैंने
तुम आज भी उसके ठेकेदार क्यों हो।
जो खेल भीड़ का चल रहा है आज
चौरासी से उसके जिम्मेदार क्यों हो।
परिवार छोड़ कर भी परिवार का हूं
तुम एक परिवार की सरकार क्यों हो।
चुनाव में अब न चलेगी तुम्हारी पसंद
पसंद को लेकर तुम्हीं गद्दार क्यों हो।
चार साल में मैं बना पेड़ बबूल का
तुम आज भी इतने हवादार क्यों हो।
मैं जीत के भी क्यों भुला दिया गया
तुम हार के भी बने यादगार क्यूं हो।
मेरी फ़ितरत है जो वो छोड़ूंगा नहीं
गले मिलने को तुम तैयार क्यों हो।
मैंने चुका दिये थे तेरे कर्ज तो सभी
तुम आज भी मेरे कर्जदार क्यों हो।
काश देख पाते मेरे हाथों का कमाल
आंख की हरकत पर शर्मसार क्यों हो।
कुत्ते ने कहा आज सरेआम मुझसे
तुम किसी और के वफादार क्यों हो।

- भूपेश पंत