शनिवार, 29 दिसंबर 2018

शोक संदेश

अस्पताल में
अति विशिष्ट व्यक्ति के
गिरते स्वास्थ्य से
चिंतित भीड़
इंतज़ार कर रही थी
एक ख़बर का
जो उसे निश्चित ही बताती
कि
आज जश्न मनाना है
या शोक

सफेद वस्त्र पहने
धीर गंभीर चेहरा लिये
वो बाहर आये
कई सफ़ेदपोश कदम
कुछ आगे बढ़े
जो
आतुर थे, आकुल थे
बेसब्र थे, व्याकुल थे
कुछ मज़लूम भी थे
भीड़ में
जो मुश्किल से खड़े हो पाये
उस मुश्किल घड़ी में

वो
तकनीकी आधार पर बोले
दुःखद है ये
हम सब के लिये
क्योंकि
हमारे जननायक
अपनी
सोचने, समझने
देखने भालने
जानने पहचानने
और सुनने बोलने
की
ताकत खो चुके हैं
और
हम उन्हें

ये सुन कर
भीड़ में शामिल
मुफ़लिसी के मारे
शख्स ने
आँखों में आँसू भर कर
आसमान की ओर देखा
गहरी सांस ली
और कहा
वो तो ये सब
पहले ही खो चुके थे
आज तो
हमने उनको खोया है
हे ईश्वर! उनकी आत्मा को शांति देना
बाकी सब ने कहा
आमीन।

- भूपेश पंत

चलो, कुछ करते हैं...

ऐसा चलो हम तुम कई बार करते हैं
इंसानों का बाग़ीचा गुलज़ार करते हैं।

जिसके पीछे चला करता था कारवाँ
फिर उस फकीर का इंतज़ार करते हैं।

ज़ुल्म की आग से थे जिनके घर जले
उनकी भी मजारों का दीदार करते हैं।

जानो क्या इशारा है लबों की ये चुप्पी
कह दो ग़ुलाम होने से इन्कार करते हैं।

वो बदल न डालें अब हर्फ़ ए वफा भी
अपने गुस्से का चलो इजहार करते हैं।

कोहरा कुछ ज़्यादा घना हुआ जाता है
हमलों के लिये बेटी को तैयार करते हैं।

मेरे इश्क़ तेरे मुश्क से सब बिगड़ गया
वतनपरस्त साबित ख़ुदमुख़्तार करते हैं।

शहीदों की चिताओं पे मेलों से क्या होगा
बुझी हुई खाक को कभी अंगार करते हैं।

मज़हब है जो तेरा वहशत नहीं सिखाता
मेरे धर्म में भी ना ही अत्याचार करते हैं।

महफूज होकर बैठे हैं संगीनों के दायरे में
यही हैं जो अपने वतन को प्यार करते हैं।

बदल पाते हैं वही अपने दौर का तरीका
जो वो नहीं करते हैं जो सरकार करते हैं।

बिगाड़ते हैं बच्चे ज्यूं तक़दीर की इबारत
यही गलती हम भी तो बार बार करते हैं।

अपने कोई चेहरे कहां होते हैं भला उनके
इंसानियत को जो लोग शर्मसार करते हैं।

मां जिसको पिला दे उनके हिस्से का दूध
बंदर के बच्चे फिर भी न तकरार करते हैं।

सियासत में ज़रूरी है ग़ुमराह भीड़ होना
जो धोखा नहीं देते वो चमत्कार करते हैं।

- भूपेश पंत

नींव के पत्थरों पर ‘पत्थरदिल’ सियासत!

(स्वतंत्रता आन्दोलन के नामचीन महानायकों और अनाम तथा उपेक्षित सेनानियों को शत शत नमन. उत्तराखंड में गांधीवाद आंदोलन की अलख जगाने वाले पिथौरागढ़ के सर्वप्रथम सेनानी स्व प्रयाग दत्त पंत और उनके छोटे भाई स्व बन्शीधर पंत को इस खेद के साथ नमन कि स्वतंत्रता आंदोलन में उनके ऐतिहासिक योगदान को आज तक उत्तराखंड का शासन प्रशासन उचित सम्मान तक नहीँ दे पाया. जिस राज्य में नैनीताल जिले के बांसी गांव निवासी 94 वर्षीय गोधन सिंह को घोषित स्वतंत्रता सेनानी होने के बावजूद जीतेजी उनका सम्मान दिलाने के लिये तीन पीढ़ियां खप गयी हों, वहां की सरकारों से और अपेक्षा भी क्या की जा सकती है? 
दुर्भाग्य ही है कि जिन सेनानियों ने धर्म, जाति और क्षेत्र से ऊपर उठ कर देश की आजादी में अपना योगदान दिया हो, उन्हें आज के राजनीतिक आका भाषा, धर्म, जाति और क्षेत्र के ही आधार पर इतिहास के पन्नों से गुम करने की साजिश रच रहे हैं। अगर ऐसा होता रहा तो बहुत जल्द इतिहास में उन्हीं लोगों का नाम रह जाएगा जिनकी पीठ पर या तो राजनीतिक सत्ता का हाथ हो या फिर जिनके नाम में किसी खास जाति के वोटबैंक को लुभाने की कुव्वत होगी। इससे ये भी साफ होता है कि जो सरकारें अपने पुरखों के बलिदान को राजनीतिक नफा नुकसान के चश्मे से देख रही हैं उन्होंने उत्तराखंड राज्य के लिये वास्तविक तौर पर संघर्ष करने वाले बलिदानियों और आंदोलनकारियों के साथ कितना न्याय किया होगा।
पंत भाइयों के सम्मान और सरकारी अपमान की इस जंग को लड़ रहे पंत परिवार के उत्तराधिकारी और सामाजिक कार्यकर्ता जनार्दन पंत Janardan Pant (हाल निवासी हल्द्वानी मो. 9410184624) 78 वर्ष की उम्र में आज भी इस मुद्दे पर वैचारिक और अदालती लड़ाई लड़ रहे हैं और जन समुदाय से समर्थन की अपेक्षा रखते हैं. उम्मीद है कि स्वतंत्रता सेनानियों के उत्तराधिकारियों के नाम पर बना प्रदेश व्यापी संगठन भी इस गंभीर मामले का संज्ञान लेगा।)

भूपेश पंत

साफ दर्ज है कि पिथौरागढ़ में ही नहीं बल्कि उत्तराखंड की धरती पर गांधी आंदोलन को शुरू करने का श्रेय स्व. प्रयाग दत्त पंत को ही जाता है. उन्होंने इलाहाबाद में बीए की डिग्री स्वर्ण पदक के साथ हासिल की और जनपद का पहला स्नातक होने का गौरव भी हासिल किया…
इस लेख की शुरुआत में फिर से अपनी बात दोहराना चाहूंगा कि जो समाज अपने इतिहास के नायकों का सम्मान नहीं करता उसकी कोख से सिर्फ खलनायक ही जन्म लेते हैं. इस बात में छिपी टीस देश की आजादी की लड़ाई से जुड़ी मेरी पारिवारिक विरासत तक सीमित नहीं है बल्कि जात-पांत और क्षेत्रवाद के दायरों में उलझे समाज और संवेदनहीन सियासत का आईना भी है. उपेक्षा, अपमान और तिरस्कार से भरी ये सच्चाई है पिथौरागढ़ जनपद के पहले स्वतंत्रता सेनानी स्व. प्रयागदत्त पंत और उनके भाई स्व. बंशीधर पंत की. सबकुछ खो देने की मंशा से आजादी के आंदोलन में कूदे इन सेनानियों ने जिस देश के लिये अपना सर्वस्व न्योछावर किया उसे हमारी सरकारें उचित सम्मान तक ना दे सकीं. इतना ही नहीं, स्व. प्रयागदत्त पंत के योगदान को राजनीतिक साजिश का शिकार बनाकर गुमनामी के अंधेरे में गुम कर दिया गया है. इस सेनानी का इससे बड़ा तिरस्कार क्या होगा कि पिथौरागढ़ जिले में उन्होंने आजादी की जो अलख जगायी, उससे प्रेरित होकर स्वतंत्रता आंदोलन में कूदे सेनानी के नाम पर वही कॉलेज समर्पित कर दिया गया जिसका नाम स्व. प्रयागदत्त पंत के नाम पर रखे जाने की मांग सालों से की जा रही थी.
कुछ सियासी नुमाइंदों की शह पर सूबे का शासन और प्रशासन इतिहास के पन्नों को बदलने की आपराधिक साजिश में भी शामिल रहा जिसका खुलासा सूचना के अधिकार के तहत मांगी गयी सूचनाओं से हुआ…
पिथौरागढ़ पीजी कॉलेज को स्व. प्रयागदत्त पंत के नाम से जोड़ने की स्वतंत्रता सेनानियों और जनता की बेहद पुरानी मांग को ठुकरा कर कांग्रेस की एनडी तिवारी सरकार ने जिन स्व. लक्ष्मण सिंह महर के नाम से उसे जोड़ा वो पिथौरागढ़ में स्व. प्रयागदत्त पंत के आजादी की अलख जगाने के बाद ही स्वतंत्रता संग्राम में आये थे. साफ है कि तिवारी सरकार का ये फैसला जाति विशेष के वोट बैंक और संकीर्ण सोच पर आधारित था और तत्कालीन कांग्रेस प्रदेश अध्यक्ष और पूर्व मुख्यमंत्री हरीश रावत के दबाव में लिया गया था. स्व. प्रयागदत्त पंत के साथ साथ यही उपेक्षा उनके भाई और स्वतंत्रता सेनानी स्व बंशीधर पंत को भी मिली. दोनों पंत भाई कांग्रेस पार्टी के पदाधिकारी भी रहे लेकिन ये कांग्रेस का ही नहीं देश का भी दुर्भाग्य है कि सम्मान देना तो दूर सूबे की सरकारों ने उनका एक तरह से तिरस्कार ही किया है. इतना ही नहीं पिछली हरीश रावत सरकार में कुछ सियासी नुमाइंदों की शह पर सूबे का शासन और प्रशासन इतिहास के पन्नों को बदलने की आपराधिक साजिश में भी शामिल रहा, जिसका खुलासा स्वतंत्रता सेनानी पंत परिवार के सदस्य और वरिष्ठ सामाजिक कार्यकर्ता जनार्दन पंत के सामने सूचना के अधिकार के तहत मांगी गयी सूचनाओं से हुआ. पेशे से वकील जनार्दन पंत स्वतंत्रता सेनानी स्व. प्रयागदत्त पंत के छोटे भाई स्वतंत्रता सेनानी स्व. बंशीधर पंत के पुत्र हैं. वो पिछले कई सालों से अपने ताऊजी (स्व. प्रयागदत्त पंत) और पिता (स्व. बंशीधर पंत) को उनकी गरिमा के अनुरूप सम्मान दिलाने की जद्दोजहद में लगे हैं लेकिन कोई नतीजा नहीं निकला. उनकी बड़ी बहिन और स्व. बंशीधर पंत की पुत्री स्व. कलावती जोशी ने भी इस बाबत लंबे समय तक हर चौखट खटखटायी लेकिन जीते जी उन्हें भी निराशा ही हाथ लगी.
स्वतंत्रता सेनानी फर्जीवाड़े पर विरोध दर्ज कराते जनार्दन पंत (पिथौरागढ़)

बनाया फर्जी स्वतंत्रता सेनानी!
स्वतंत्रता आंदोलन से जुड़े लोगों की फेहरिस्त में न तो इस नाम के किसी व्यक्ति का रिकॉर्ड है और ना ही उनके नाम पर इस मद में कभी कोई पेंशन जारी की गयी है…
सूचना के अधिकार के तहत जनार्दन पंत को ये चौंकाने वाली जानकारी मिली कि पिथौरागढ़ ज़िले में जिन स्व. रुद्र सिंह बसेड़ा को स्वतंत्रता सेनानी बताकर राजकीय इंटर कॉलेज रोड़ीपाली का नामकरण किया गया, उनका नाम स्वतंत्रता संग्राम सेनानियों के रिकॉर्ड में दर्ज ही नहीं है. जबकि पिथौरागढ़ के तत्कालीन कांग्रेसी विधायक मयूख महर ने उनके नाम के शिलापट का आनावरण करते हुए कहा था कि क्षेत्र के स्वतंत्रता सेनानियों के नाम को अक्षुण्ण बनाये रखने के लिये उनकी विधानसभा क्षेत्र के नौ शैक्षणिक संस्थानों के नाम स्व. रुद्र सिंह बसेड़ा जैसे महान स्वतंत्रता सेनानियों के नाम पर रखे गये हैं. इस मौके पर विधायक जी ने स्व. रुद्र सिंह बसेड़ा की ओर से इलाके में विद्यालय बनाने के लिये कई नाली जमीन दान पर देने का जिक्र किया था. लेकिन जब जनार्दन पंत ने स्व. बसेड़ा के स्वतंत्रता संग्राम में उल्लेखनीय योगदान की पड़ताल करनी चाही तो पता लगा कि स्वतंत्रता आंदोलन से जुड़े लोगों की फेहरिस्त में न तो इस नाम के किसी व्यक्ति का रिकॉर्ड है और ना ही उनके नाम पर इस मद में कभी कोई पेंशन जारी की गयी है.
बंशीधर पंत ने पिथौरागढ़ के सिमलगैर में खादी और सिंगर सिलाई मशीन के पुर्जों की दुकान खोली. उन्होंने अपनी दुकान में तिरंगा झंडा लगा रखा था जिसे हटवाने के लिये अंग्रेज प्रशासन ने उनके पूरे परिवार को प्रताड़ित किया…
राज्य में फर्जी स्वतंत्रता सेनानी बनाने का ये मामला सामने लाने और दोषियों पर कानूनी कार्रवाई शुरू करवाने के लिये कागजी कार्यवाही कर रहे जनार्दन पंत आरोप लगाते हैं कि उत्तराखंड की पिछली हरीश रावत सरकार का ये रवैया क्षुद्र राजनीति, जातीय समीकरण और क्षेत्रवाद से प्रेरित था. पंत परिवार की ऐतिहासिक विरासत को लेकर राज्य सरकारों की उपेक्षा से क्षुब्ध जनार्दन पंत वजह जानना चाहते हैं कि आज़ादी के 70 साल बाद भी इन दोनों सेनानियों के नाम पर इनके अपने गृह जनपद पिथौरागढ़ में आजतक एक भी सार्वजनिक संस्थान क्यों नहीं है? क्या वजह है कि उत्तराखंड में आये दिन घोषित-अघोषित स्वतंत्रता सेनानियों के नाम पर शिक्षण संस्थाएं, सड़कें और दूसरे सार्वजनिक संस्थान बांटने वाली पिछली रावत सरकार इन दोनों पंत भाइयों के नाम पर चुप्पी साधे रही? पंत कहते हैं कि पिथौरागढ़ में स्व. रुद्र सिंह बसेड़ा को स्वतंत्रता सेनानी के रूप में स्थापित करना और दो घोषित स्वतंत्रता सेनानियों की उपेक्षा करना इस बात का प्रमाण है कि पिछली हरीश रावत सरकार इस बाबत लिये गये अपने फैसलों में किसी छिपे एजेंडे के तहत काम कर रही थी. ऐतिहासिक साक्ष्यों के साथ की जा रही इस तरह की छेड़छाड़ सरकार के उच्च पदस्थ लोगों की मिलीभगत या शह के बिना मुमकिन नहीं है, लिहाजा इस खुलासे से निवर्तमान कांग्रेस सरकार के दूसरे फैसलों पर भी संदेह किये जाने के वाजिब कारण हैं. स्वतंत्रता सेनानी को लेकर हुए फर्जीवाड़े को लेकर जनार्दन पंत ने पिछले साल महामहिम राज्यपाल को भेजे ज्ञापन में स्व. बसेड़ा को स्वतंत्रता सेनानी घोषित करने की कार्यवाही में लिप्त साजिशकर्ताओं और स्वतंत्रता संग्राम सेनानियों को लेकर तत्कालीन कांग्रेस सरकार के सभी फैसलों की सीबीआई या किसी उच्च स्तरीय संस्था से जांच कराने की मांग की थी ताकि सरकार और प्रशासन में उच्च पदों पर बैठे जन प्रतिनिधियों और अधिकारियों की कारगुजारियां बेनकाब हो सकें. साथ ही उन्होंने स्व. प्रयागदत्त पंत और स्व. बंशीधर पंत का नाम उनकी गरिमा के अनुरूप पिथौरागढ़ जनपद के नाम या बड़ी शैक्षणिक संस्था से जोड़ने और स्व. प्रयागदत्त पंत की जीवनी को स्कूलों के पाठ्यक्रम में जगह देने की मांग भी दोहराई. जनार्दन पंत ने उत्तराखंड के काबीना मंत्री और क्षेत्रीय बीजेपी विधायक प्रकाश पंत से इस गंभीर मुद्दे पर उचित कार्रवाई करने और पंत भाइयों के त्याग को उचित सम्मान दिलाने की मांग की है.
 क्या किया पंत भाइयों ने!
बंशीधर पंत को अगस्त 1942 में जेल भेज दिया गया. परिवार दाने दाने को मोहताज था और दो बच्चे मृत्युशैया पर पड़े थे….. कुछ दिन पश्चात उनका एक पुत्र चल बसा.
बीडी पांडे लिखित कुमाऊं के इतिहास पर नज़र डालें तो स्व. प्रयाग दत्त पंत को पिथौरागढ़ जनपद (तत्कालीन अल्मोड़ा जनपद की सीमान्त तहसील) के पहले स्वतंत्रता सेनानी के रूप में जाना जाता है. आज़ादी की लड़ाई में पं. गोविंद बल्लभ पंत, पं हरगोविंद पंत और बी. डी. पांडे के समकक्ष रहे प्रयागदत्त पंत को पिथौरागढ़ जिले में गांधीवादी आंदोलन का सूत्रधार माना जाता है. इतना ही नहीं उत्तराखंड की सिविल सेवाओं की परीक्षा हेतु राज्य के समग्र अध्ययन के लिये बौद्धिक प्रकाशन से प्रकाशित केशरी नंदन त्रिपाठी की सामान्य अध्ययन पुस्तिका में साफ दर्ज है कि पिथौरागढ़ में ही नहीं बल्कि उत्तराखंड की धरती पर गांधी आंदोलन को शुरू करने का श्रेय स्व. प्रयाग दत्त पंत को ही जाता है. उन्होंने इलाहाबाद में बीए की डिग्री स्वर्ण पदक के साथ हासिल की और जनपद का पहला स्नातक होने का गौरव भी हासिल किया. गांधीजी के असहयोग आंदोलन के संदेश को अपने ओजस्वी विचारों के ज़रिये कुमाऊं के दूरदराज इलाकों के पिछड़े इलाकों में फैलाने वाले प्रयागदत्त पंत 1921 में बागेश्वर में आयोजित कुली-बेगार उन्मूलन आंदोलन में पिथौरागढ़ का प्रतिनिधित्व करने वाले एकमात्र व्यक्ति थे. उनकी अकाल मृत्यु के बाद देश की आजादी के उनके अधूरे सपने को पूरा करने का बीड़ा उनके छोटे भाई स्व. बंशीधर पंत ने उठाया. बर्मा में जापानी हमले के बाद 1940 में पिथौरागढ़ आये बंशीधर पंत ने पिथौरागढ़ के सिमलगैर में खादी और सिंगर सिलाई मशीन के पुर्जों की दुकान खोली. उन्होंने अपनी दुकान में तिरंगा झंडा लगा रखा था जिसे हटवाने के लिये अंग्रेज प्रशासन ने उनके पूरे परिवार को प्रताड़ित किया. पिथौरागढ़ तहसील के कांग्रेस संगठन मंत्री की हैसियत से बंशीधर पंत को अगस्त 1942 में जेल भेज दिया गया. परिवार दाने दाने को मोहताज था और दो बच्चे मृत्युशैया पर पड़े थे. उन्हें इस शर्त पर छोड़ा गया कि सत्याग्रह करने पर सरकार को सूचित करना होगा और हाज़िरी लगानी होगी. कुछ दिन पश्चात उनका एक पुत्र चल बसा. 1946 तक बंशीधर पंत ने किसान संगठन का काम किया जिसमें छत्रसिंह आजाद, जगत सिंह चौहान, हरिदत्त शास्त्री और धर्म सिंह जैसे सेनानियों का उन्हें पूरा सहयोग मिला. बंशीधर पंत ने रजवारशाही के खिलाफ किसानों के उल्लेखनीय अहिंसात्मक संघर्ष का नेतृत्व करते हुए ज़मींदारों की बंदूकें छीन कर मालखाने में जमा करवाईं और भूमिहीनों के हक हकूक के लिये संघर्ष किया.
  08/07/2017

मुद्दे

वो मुद्दे बनाते हैं
बर्फ के गोलों की तरह
और
उछाल देते हैं
चारों तरफ़ फैल जाते हैं
उन्हीं के मुद्दे
और
उनके बीच खो जाते हैं
कुछ के
जीने के अधिकार
कुछ के
बोलने के अधिकार
कुछ के
सोचने के अधिकार
और लोग
आपस में ही लड़ मरते हैं
सत्ता को
सही और गलत ठहराने में
वो
विजेता की तरह
डोलती है
उसका अट्टहास
सुन्न कर देता है दिमाग़ों को
पीछे धकेल देता है
इस सच को
कि
सत्ता का होना
तभी सार्थक है
जब
उसके दूरंदेश हाथों में हों
हमारे मुद्दे
कि
एक दिन
ये निगल जाएगी
हर अपने पराये को
क्योंकि
सत्ता की भूख
लगातार बढ़ रही है।

- भूपेश पंत

अक्ल पर पाला!

खफ़ा होकर बैठे हैं वह इस पाले में
क्यूंकर गये कुछ लोग उस पाले में।

रहना है अगरचे उन्हें किसी पाले में
तो क्यों नहीं आ जाते इसी पाले में।

सत्ता की भूख नचाती है उनको ऐसे
कभी इस पाले में कभी उस पाले में।

सियासियों ने बांट दिया है इस कदर
जो नहीं इस पाले में वो उस पाले में।

उनके होने का कोई मायना नहीं होगा
जो न इस पाले में और न उस पाले में।

हाकिम रख रहे हैं सबका हिसाब देखो
कौन कौन है यहां किस किस पाले में।

बिछ गयी है यों खुदगर्जी की बिसात
इंसानों की जगह नहीं किसी पाले में।

अकलियत के दुश्मन हर जगह ही हैं
कुछ उस पाले में तो कुछ इस पाले में।

वहशत के डर से जो हो गयी है बेघर
मुहब्बत अब जा रहेगी किस पाले में।

- भूपेश पंत

आदम जात!

ये
आदम
नहीं
कुत्ते की जात है
जिसके लिये
मादा का
जिस्म
दूध भात है
या फिर
हड्डियों पर चिपका
गर्म गोश्त
चल
जात बदल लें
मेरे दोस्त!

- भूपेश पंत

अक्सर!

हाकिम इस तरह इंतिख़ाब को अंजाम देंगे
काट कर गले इसे, जम्हूरियत का नाम देंगे।

अक्ल की पुड़िया बना कर रख लो जेब में
बहके हुओं को अब वो कोई बड़ा काम देंगे।

हर बात पर करते हो, तुम इत्ते शिकवे गिले
ढूंढ कर तुम्हें इक दिन ज़िहनी आराम देंगे।

बेच कर खा जाएंगे कफ़न भी शहीदों का
उन्मादियों को वतन परस्ती का ईनाम देंगे।

आवाम जो ठान ले सच को सुनने की ज़िद
झूठ की शराब का कब तलक वो जाम देंगे।

बात मत करना उनकी सियासी सोच की
मां बहन की गालियां, गद्दारी इल्ज़ाम देंगे।

जिनके भरोसे बैठे हो सुबह के इंतज़ार में
सूरज को छिपा कर नफ़रत भरी शाम देंगे।

सज गयी सरेआम ईमान फ़रोशों की मंडी
ज़मीर की लाश लाना, वो अच्छे दाम देंगे।

- भूपेश पंत

लोग देखते हैं..

पेट की आग पे ख़ुदगर्जी की रोटी सेंकते हैं
बहलाने के लिए कुछ टुकड़े रोज फेंकते हैं।
लुटी अस्मतों का दर्द वो जानेंगे भी तो कैसे
इनसे ही हैं जो वहशियत का राग छेड़ते हैं।
तुम कहां उलझ गये तकनीक के जमाने में
जनाब मशीनों से नहीं दिमाग़ों से खेलते हैं।
भूख से तड़प तड़प कर मरते हैं जब बच्चे
हुक्मरान तब कैमरों के सामने दंड पेलते हैं।
रोग, ग़रीबी, लाचारी चुनावी बातें हैं तुम्हारी
कुछ उनसे पूछो जो ये मसले रोज झेलते हैं।
नाइत्तफ़ाकी को दबा कर होगा क्या हासिल
अरे जो ये नहीं देखते वो कुछ और देखते हैं।
ठान लिया बनना जबसे सियासत के काबिल
हम खुद से ही ग़िरेबान को अपना उधेड़ते हैं।
माफ़ भी कर दे तू अब उनकी नादानियों को
अपनी ज़ुबान से खुद अपना राज़ खोलते हैं।
न खत्म होने देंगे वह हमारे दिलों की गिरह
नफ़रत के तराज़ू में रख जो इंसान तोलते हैं।
बहक न जाना तुम उनकी आकाशवाणी से
इन्सां भी नहीं खुद को जो भगवान बोलते हैं।

- भूपेश पंत

सत्ता की साँप-सीढ़ी

सच
एक साँप की तरह है
जो
अपना फन उठा कर
रोक सकता है
तुम्हारे अहंकार का राजपथ
कभी भी
वो
तुम्हारे पड़ाव को
तब्दील कर सकता है
मंज़िल में
उसकी एक फुंकार
पड़ सकती है
तुम्हारी बदनीयती पर भारी
उसका शांत हलाहल
किसी दिन
उतार सकता है
बददिमाग भीड़ पर
उड़ेला गया
तुम्हारा गर्म और ख़ूनी नशा
उसका डर 
निकाल सकता है
किसी दिन
तुम्हारे ख़ौफ़ की चीख़
वो तुम्हारे
पैरों पर लिपट कर
दे सकता है
वही
गिजगिजाता अहसास
जो
व्यवस्था के अंधकार में
दबोच ली गयीं
मासूम बच्चियों के
शरीर से लेकर
अंतर्मन तक बेशर्म हुआ होगा
वो एक दिन
तुम्हारे मुंह से निकले
झाग की तरह
खुद को ला सकता है
सब के सामने
तुम्हारे ही भीतर से
इस सर्प का कड़ुवा दंश
तुम्हारे
आस्थायुक्त दांतों से
कहीं ज़्यादा
गहरा है
तो
सत्ताधीशो
तुम समझ चुके हो
कि
सच का होना
वाज़िब नहीं है तुम्हारी दुनिया में
समय रहते
इस सांप को कुचलने
पर ही
टिका है, तुम्हारा वजूद

- भूपेश पंत

पानी

पानी का भी एक रंग होता है
इतना काफ़ी है
कि
बेरंग होता है
तुम अपनी अय्याशियों के लिये
ढाल दो
चाहे किसी भी रंग में
लेकिन जब हलक
सूख कर
तालू से चिपक जाती है
ज़ुबान
और मौत क़रीब दीखती है
तो
यही पानी
बन जाता है जीने की ज़रूरत
क्योंकि
ये मौत के सामने भी
अपना
रंग नहीं छोड़ता
बना रहता है बेरंग

- भूपेश पंत