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बुधवार, 2 सितंबर 2009

सपने-2..... एक लघु कविता

मुट्ठी भर रेत की तरह 

धीरे-धीरे ग़ुम हो जाने के बावजूद

वो नहीं छोड़ता सपने देखना

क्योंकि

सत्ताधीशों की मंडी में

सिर्फ़ सपने ही 

बिना क़ीमत बिकते हैं।

सपने-1..... एक लघु कविता

अचानक आंसू की तरह टपक पड़ते हैं

सपने

और उलझ कर

उसके लंबे स्याह केशों में

लहरा उठते हैं

किसी

खुशबूदार तेल के विज्ञापन की तरह। 

सोच...एक लघु कविता

सोचो,

क्योंकि जीने के लिये ज़रूरी है कुछ सोचना

क्योंकि इंसान की फ़ितरत है सोचना

ये अलग बात है

कि

सोचते रहने से ज़िंदग़ी कम होती है...

सोमवार, 1 जून 2009

कविता का दुर्भाग्य

मैं कवि हूं क्योंकि कविता करता हूं...
मौत से बहुत डरता हूं 
इसलिये 
सिर्फ़ मौत पर कविता करता हूं
मौत इंसान की हो या पशु की...

माता की हो या शिशु की..
एक मौत 
यानी एक कविता
अभी तक ना जाने कितनी मौतें मेरी कविता बनी हैं... 
जाने कितने मजहबों के लहू से सनी हैं..
अब तो पूरा संकलन बन चुका है
जिसका नाम मैंने एकता रखा है..
 
मौत धर्मनिरपेक्ष होती है..
क्योंकि वो धर्म या जाति के आधार पर नहीं आती है..
आती है और किसी को भी ले जाती है
इसलिये मौत लो और धर्मनिरपेक्ष हो जाओ..
नेता हो तो मौत की राजनीति अपनाओ...
 
मेरी कविता ज़िंदगी से दूर है 
क्योंकि 
ज़िंदगी पर लिखना उतना ही कठिन है
जितना ज़िंदगी को जीना
इसीलिये मेरी कविता का विषय सदा मौत रहा है..
ज़िंदगी की तरह मौत को ढूंढना नहीं पड़ता 
वो आजकल हर जगह मिल जाती है
 
हर समझदार व्यक्ति अब इसे अपना चुका है
ये विषय
अब राष्ट्रीय महत्व पा चुका है...
मौतें होती हैं तो संपादक संपादकीय लिखता है..
मरने वाले के परिवार को मुआवज़ा मिलता है
नेता उनका अस्थिकलश बनवाता है
और वोटों के लिये गली गली घुमाता है...
 
लेकिन
मैं उस मौत को सहेज लेता हूं अपनी कविता बना कर
जोड़ देता हूं किताब के मध्य पन्ना 
इस आस में कि 
शायद
इतने लोगों का बलिदान व्यर्थ ना जाये
और
मुझे इस संकलन पर कोई पुरस्कार मिल जाये..
 
मौतें अब मेरी ज़रूरत बन चुकी हैं..
सोचता हूं जिस दिन कोई नहीं मरेगा
उस दिन मुझे मरना होगा
एक कविता बन संकलन में छप जाने के लिये 
मौतें होना ही मेरे कवित्व का सौभाग्य है...
और शायद यही
मेरी कविता का दुर्भाग्य है.....

गुरुवार, 20 नवंबर 2008

हादसे-एक ग़ज़ल



जो कभी ज़हर के प्याले थे अब जाम हो गये हैं
हादसे मेरे शहर में अब आम हो गये हैं....
छपती थी सुर्ख़ियों में कभी क़त्ल की इबारत
इंसानियत के क़ातिल अब ग़ुमनाम हो गये हैं...
जो वेश धर रावण का, पेट भरा करते थे
वो सभी बहुरूपिये अब राम हो गये हैं...
सुकूं पाते थे जिस कब्र पर थोड़ा ठहर कर
वहीं हमारी मौत के इंतज़ाम हो गये हैं...
न चल सकोगे तुम भी मेरे साथ हमसफर
हम भी शहर में आजकल बदनाम हो गये हैं...
ज़माने के साथ कुछ तो बदलना सीखो शरीफज़ादो
चोरी, डकैती, क़त्ल अब बड़े काम हो गये हैं...

मंगलवार, 10 जून 2008

अबोध भक्ति


मैंने बड़े आश्चर्य से देखा
वो नन्हा बालक
हिंदुस्तान के नक्शे को ज़मीन में रख
उसमें बाल्टी भर भर के
पानी डाल रहा था....
मैंने पूछा उस अबोध बालक से
इस हरकत का उद्देश्य
तो वो बड़ी मासूमियत से बोला
अंकल, मैं अपना देश बचा रहा हूं
रेडियो कह रहा था....
हिंदुस्तान जल रहा है ।