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मंगलवार, 20 अक्टूबर 2015

एक जनांदोलन की मौत

भूपेश पंत

लड़ भिड़ कर उत्तराखंड के लोगों ने अलग राज्य की अपनी मांग मनवा ही ली। इस मांग को लेकर हुए जनांदोलन को इक्कीस साल बीत गये और राज्य मिले पंद्रह साल। यूपी के पर्वतीय इलाके की उपेक्षा और योजनाओं में पहाड़ की अनदेखी के आक्रोश से जन्मा था ये जनआंदोलन। हर क्षेत्र में पिछड़े इस पर्वतीय इलाके के लोगों का गुस्सा भड़काने का काम किया आरक्षण के मुद्दे ने। लोग आरक्षण के विरोधी नहीं थे लेकिन भौगोलिक आधार पर अपने पिछड़े होने के बावजूद जातीय आधार पर अवसरों में कटौती का अहसास उन्हें सड़कों पर उतार लाया और देखते देखते ये आंदोलन अलग राज्य की मांग में तब्दील हो गया। क्या छात्र, क्या महिलाएं, क्या कर्मचारी और क्या कारोबारी, अपने अस्तित्व को बचाने की इस जद्दोजहद में हर कोई भागीदार था। राजनीतिक दलों ने आंदोलन की आंच में सियासी रोटियां सेंकनी शुरू कीं लेकिन जनता के इस आंदोलन की कमान ना तो कोई सियासी दल अपने हाथ में ले पाया और ना ही कोई नेता। तत्कालीन यूपी सरकार का दमनचक्र भी चरम पर था। खटीमा, मसूरी, नैनीताल, मुजफ्फरनगर से लेकर दिल्ली तक खून के छींटे भी उड़े और आंदोलन की तपिश भी महसूस की गयी। सड़कों पर उतरा हर व्यक्ति अलग राज्य के निर्माण में अपनी भागीदारी निभा रहा था। भागीदार वो भी थे जो अपने घरों, मोहल्लों और गांवों में पुलिसिया गिरफ्त से बच कर पहुंचे अनजाने चेहरों को छत और खाना मुहैया करा रहे थे। भागीदार वो लोग भी थे जिन्होंने आंदोलन की कामयाबी की दुआएं मांगीं।

इस जन आंदोलन ने उत्तराखंड को बहुत कुछ दिया। अपमान, पीड़ा, शहादत, उत्पीड़न और बलात्कार की नींव पर उत्तराखंड राज्य का निर्माण हुआ और साथ ही मिली आंदोलन से उभरे नेताओं की नयी फौज। ये वो लोग थे जिनमें उत्तराखंड राज्य को लेकर भावनाओं का ज्वार था, कुछ सपने थे और व्यवस्था के प्रति एक आक्रोश था। सियासत में अधपके ये लोग सियासी दलों के खांटी नेताओं के लिये बहुत बड़ा खतरा थे जो नये राज्य के निर्माण में अपने लिये नयी संभावनाएं तलाश रहे थे। जो नेता जन आंदोलन की अगुवाई तक नहीं कर पाये वही नये राज्य की सियासत के सबसे बड़े सूबेदार बन कर अगली पंक्ति में जा खड़े हुए। नेताओं और नौकरशाहों के चमकते चेहरे अपनी सियासी और माली हालत में सुधार की पूरी गुंजाइश देख रहे थे। खतरा था तो बस उन नौजवानों और जागरूक बुद्धिजीवियों से, जो अपने सपनों के नये राज्य में पहाड़ के सुलगते सवालों का हल तलाश रहे थे। बस यहीं से शुरू हुई आंदोलन में भागीदारी के रिटर्न गिफ्ट बांटने की सियासत। नवोदित पर्वतीय राज्य के सियासी आकाओं ने आंदोलन से जुड़े लोगों को सहूलियतों, रियायतों, प्रमाणपत्रों और नौकरियों का झुनझुना दिखाना शुरू किया। ये वो सियासी दांव था जो और किसी भी नवोदित राज्य में नहीं चला गया। लोगों को भी लगा कि अगर सरकार उनके त्याग और बलिदान की कीमत चुका रही है तो इसमें बुरा क्या है। आंदोलनकारियों के चिह्नीकरण के नाम पर लोगों को खेमों में बांट दिया गया। अपने अपने लोगों को आंदोलनकारी घोषित करने की औपचारिकता शुरू हुई। आंदोलन के दौरान मारे गये शहीदों के नाम पर स्मारक बना कर औपचारिकता पूरी कर दी गयी। सोचा ये जाना था कि नये राज्य के पुराने मुद्दों का हल कैसे मिले, पहाड़ की दुश्वारियां कैसे दूर हों और विकास के सपनों को कैसे साकार किया जाये। लेकिन आंदोलन की कोख से जन्मे आंदोलनकारी अपनी ऊर्जा इस बात पर खर्च करने लगे कि आंदोलन में भागीदारी की ज्यादा से ज्यादा कीमत उन्हें कैसे मिले और दूसरों को कैसे नहीं। पहाड़ के वास्तविक मुद्दों को पेंशन की रकम, चिह्नीकरण में आ रही दिक्कत, सम्मान पाने की होड़ और रियायतों की झड़ी से ढक दिया गया। जुझारू लोगों को सुविधाभोगी बनाने की साजिश रची गयी। वो आंदोलनकारी जो नये राज्य के बेहतर निर्माण में नींव के पत्थर बन सकते थे उन्हें एक ऐसे ढांचे के कंगूरे बना कर सजा दिया गया जिसकी नींव में भ्रष्टाचार, ऐय्याशी, शराब माफिया, खनन माफिया, भू माफिया और अपराध जैसी दीमकें आज भी रेंग रही हैं। सियासी दलों को अपने इस दांव से राहत भी मिली और रोजगार भी। कुछ आंदोलनकारी आज भी राज्य के मुद्दों को लेकर छिटपुट लड़ाई लड़ रहे हैं लेकिन स्वार्थों की सियासत न तो उन्हें एकजुट होने दे रही है और न ही मजबूत। राज्य आंदोलनकारियों के नाम पर हो रही सियासत का ये एक ऐसा भद्दा चेहरा है जो लोगों के त्याग और कुर्बानियों को सरकारी पलड़े में तोल कर उसकी बोली लगा रहा है। हैरानी की बात तो ये है कि सियासत के इस मकड़जाल में फंसे लोग खुद आगे बढ़ चढ़ कर अपनी बोली लगा रहे हैं। जैसे कि वो आंदोलन में कूदे ही थे ये सब पाने के लिये। ये जनांदोलन और उससे जुड़े सपनों की मौत नहीं तो और क्या है?    


मजबूर नहीं मजबूत विपक्ष चाहिये


(भूपेश पंत)

उत्तराखंड के विधानसभा चुनावों में डेढ़ साल का समय बचा है लेकिन सूबे की सरकार के कामकाज को लेकर विपक्षी बीजेपी के हमलों में धार अब भी नहीं आ रही है। राज्य की कांग्रेस सरकार शिक्षकों और चिकित्सकों को पहाड़ चढ़ाने में नाकाम रही है। आपदा के ढाई साल बाद भी कई जगहों पर मरम्मत का काम धरातल पर दिखायी नहीं दे रहा है। सरकार विकास योजनाओं की गठरी पीठ पर लादे पहाड़ की ओर मुंह कर एक ही जगह पर खड़ी दौड़ लगा रही है, लेकिन जो इन विकास कार्यों को गांवों तक पहुंचाने का दबाव बना सके ऐसा विपक्ष सीन से ही नदारद है। बीजेपी पहाड़ की वास्तविक समस्याओं को आंदोलन का रूप देने में नाकाम रही है। लगता है कि या तो बीजेपी में इस बार अपनी सरकार को लेकर हद से ज्यादा भरोसा है और वो पहाड़ के बेकार मुद्दों में उलझना नहीं चाहती, या फिर उसके पास इन समस्याओं का समाधान है ही नहीं। दूसरी बात ज्यादा तर्क संगत लगती है क्योंकि राज्य में वो पहले दो बार सरकार बना चुकी है और उस दौरान भी पहाड़ को लेकर कोई ठोस कार्ययोजना बनती नज़र नहीं आयी। मुख्यमंत्री के बहिष्कार, कुछ धरने प्रदर्शनों और ज्ञापनों के ज़रिये महज़ विरोध की औपचारिकता निभा रही बीजेपी का ये रवैया पहाड़ का अहित कर रहा है।
विपक्ष का काम सरकार पर जनहित के कार्यों के लिये दबाव बनाना, लोगों की समस्याओं और मुद्दों को हल करवाना और प्रक्रियागत खामियों पर सरकार का ध्यान खींचना होता है। लेकिन सूबे की मौजूदा सरकार की घोषणाएं बयां करती हैं कि उस पर कम से कम विपक्ष का दबाव तो नहीं है। अलबत्ता सरकार छोटे छोटे जन संगठनों की ओर से उठायी जा रही पहाड़ी गांवों के विकास की मांग से ज़रूर प्रभावित नज़र आ रही है। सरकार मंत्रियों, विधायकों और नौकरशाहों को गांवों की पथरीली ज़मीन पर उतारने जा रही है। इसके अलावा खेती और संस्कृति को बचाने के झुनझुने भी बजाये जा रहे हैं। पहाड़ के विकास की योजनाएं कितनी ईमानदारी से धरातल पर उतर पाएंगी इसे देखने की ज़िम्मेदारी राज्य की एकमात्र विपक्षी पार्टी के कंधों पर है लेकिन लगता है कि केंद्र की मोदीमय सत्ता की हवा ने उसे मदहोश कर दिया है। पार्टी बीजेपी विधायकों के साथ दुर्व्यवहार को लेकर रावत सरकार पर लोकतंत्र की हत्या करने का आरोप लगा रही है। लेकिन बतौर विपक्ष खुद लोकतंत्र को मजबूत करने में कितनी कामयाब रही है बीजेपी को ये भी पर्वतीय राज्य की जनता को बताना चाहिये। पार्टी ने सीडी कांड की सीबीआई जांच, आबकारी घोटाला, आपदा घोटाला और खनन घोटाले जैसे मुद्दे उठाए तो ज़रूर लेकिन ना तो वो इन पर सरकार को घेर पायी और ना ही पहाड़ के बुनियादी सवालों को हल करवा पायी। कांग्रेस सरकार के पूरे कार्यकाल में विपक्ष घोटाले ही घोटाले तलाशता रहा लेकिन उसकी आक्रामकता मुद्दों के हल से कहीं ज्यादा लूट में हिस्सा ना बंटा पाने की खिसियाहट में तब्दील होती ही नज़र आयी। मौजूदा सरकार के मुखिया हरीश रावत ने विधानसभा में जब धमकी भरे अंदाज में सबकी पोल खोलने का दांव फेंका तो न जाने क्यों विपक्ष से एक भी आवाज़ इस चुनौती को कबूल करने के लिये नहीं उठी। मुख्यमंत्री का ये बयान लोकतंत्र का कितना बड़ा उपहास था, ये बात ना तो विपक्ष को समझ में आयी और ना ही राज्य के तथाकथित जन संगठनों को। जनता के प्रति अपनी जवाबदेही को लेकर सरकार और विपक्ष कितना संजीदा है ये घटना उसे बयान करने के लिये काफी है।    
ऐसा नहीं है कि सरकार ने विपक्ष को मुद्दे थमाने में कोई कोताही बरती हो। कभी मुख्यमंत्री नौकरशाहों की मनमर्जी का रोना रोते नज़र आते हैं तो कभी गैरसैंण को ग्रीष्मकालीन राजधानी बनाने का मुद्दा गरमाते हैं। पलायन के कारण वीरान होते गांव हों या आपदा राहत के नाम पर चल रही बंदरबांट, शिक्षा  स्वास्थ्य और पेयजल से जुड़े मसले हों या पहाड़ से जुड़ी लोकलुभावन घोषणाएं, विपक्ष के पास व्यावहारिकता और भ्रष्टाचार को लेकर सरकार को टोकने का मौका हमेशा रहता है। लेकिन राष्ट्रीय पार्टी होने के अलावा और कौन सी ऐसी सियासी मजबूरी है जिसने बीजेपी के पर्वतीय जनप्रतिनिधियों को मुखर होने से रोक रखा है। नेता प्रतिपक्ष भले ही इन आरोपों से इंकार करें लेकिन सच तो ये है कि बीजेपी ने सदन के भीतर और बाहर जिन कुछ मुद्दों पर सरकार को घेरा भी उनका जन सरोकारों से कोई सीधा रिश्ता है ही नहीं। किसी भी राज्य के लिये विधानसभा सत्र बेहद अहम होता है जबकि विधायक अपने अपने क्षेत्रों की समस्याओं को उठा पाते हैं। लेकिन हर बार सदन के पटल पर रखे गये सवाल हंगामे की भेंट चढ़ जाते हैं। विपक्ष की कमजोर रणनीति हर बार सरकार को बच निकलने का मौका ही देती रही है।
पहाड़ की जनता को इस मामले में उत्तराखंड क्रांति दल से भी निराश ही हाथ लगी है। पार्टी के एकमात्र विधायक कैबिनेट मंत्री के रूप में कांग्रेस की गोद में जा बैठे हैं और संगठन के पांव तले जैसे ज़मीन ही गायब है। गुटों में बंट कर अपनी पहचान खो चुकी यूकेडी अगर पहाड़ की जनता के मुद्दों को आक्रामकता से उठाती तो शायद उनके दिलों में कुछ जगह भी बना पाती। लेकिन खुद को बचाने की कशमकश में ही उलझी ये क्षेत्रीय पार्टी कभी इन मुद्दों की तरफ लौट भी पाएगी ऐसी उम्मीद करना फिलहाल बेमानी लगता है। पहाड़ की अस्मिता के संघर्ष में जुटे छोटे छोटे राजनीतिक और गैर राजनीतिक संगठन स्थानीय स्तर पर इन समस्याओं के लिये संघर्ष कर रहे हैं लेकिन उन्हें एक सूत्र में पिरो सके ऐसी कोई राजनीतिक शक्ति उभर पाएगी इसे लेकर भी संदेह बना हुआ है। पहाड़ के इस तरह बंटे होने का सियासी लाभ हमेशा की तरह कभी कांग्रेस तो कभी बीजेपी उठाती आयी हैं, इसलिये सत्ता और विपक्ष के बीच की सियासत नूराकुश्ती से ज्यादा नहीं रह गयी है। 


विरासत के पन्ने फाड़ रही कांग्रेस


अजय ढौंडियाल का लेख

(उत्तराखंड की हरीश रावत सरकार स्वतंत्रता सेनानियों के नाम पर दनादन घोषणाएं कर अपनी पीठ कितनी ही थपथपा लें, लेकिन सेनानियों की इस फेहरिस्त को जातीय चश्मे और राजनीतिक समीकरणों के आधार पर बुना गया है। जिस राज्य में नैनीताल जिले के बांसी गांव निवासी 94 वर्षीय गोधन सिंह को घोषित स्वतंत्रता सेनानी होने के बावजूद जीतेजी उनका सम्मान दिलाने के लिये तीन पीढ़ियां खप गयी हों, वहां की कांग्रेस सरकार से और अपेक्षा भी क्या की जा सकती है? क्या कांग्रेस अपनी ही राजनीतिक विरासत के उन पन्नों को फाड़ देना चाहती है जिनका कोई सियासी वजूद नहीं है या जो उसके जातीय खांचे में फिट नहीं होते? पिथौरागढ़ जनपद के दो स्वतंत्रता सेनानी पंत भाइयों को लेकर सरकार का रवैया तो कुछ ऐसा ही दिखता है। सम्मान और अपमान की इस जंग को लड़ रहे सेनानी परिवार से जुड़े और वरिष्ठ सामाजिक कार्यकर्ता जनार्दन पंत से संपादक अजय ढौंडियाल की बातचीत पर आधारित।)       

जिस देश में गांधी को दिलों में नहीं नोटों पर छापा जाता हो और जहां अंबेडकर जैसे जन नेताओं को जाति के चश्मे से देखा जाये वहां उन लोगों की क्या बिसात जिनके नाम आज़ादी के इतिहास के पन्नों से कभी बाहर ही न निकल पाये हों। राष्ट्रपिता गांधी जी को लेकर संघ और बीजेपी का दृष्टिकोण सब जानते हैं लेकिन ताज़्जुब तब होता है जब आजादी के आंदोलन को अपने अतीत का सुनहरा पन्ना बना कर आज तक सहेजने वाली कांग्रेस के ही नेता उन स्वतंत्रता सेनानियों का अपमान करने में भी न हिचकिचाएं जिन्होंने कांग्रेस के चरखे तले देश के दूरदराज इलाकों में आजादी की अलख जगाई। देश के लिये अपनी जान तक कुरबान करने का जज़्बा रखने वाले इन सेनानियों को जातीय संकीर्णता के चश्मे से देखना और उनके योगदान को भावी पीढ़ी तक पहुंचने से रोकना ना सिर्फ उनकी शहादत का अपमान है बल्कि देश का अपमान है और शायद देशद्रोह भी। 
उत्तराखंड की कांग्रेस सरकार भी ऐसा ही एक अपराध कर रही है। देश को आज़ाद हुए भले ही 68 साल बीत गये हों लेकिन इतिहास के पन्नों में दर्ज स्वतंत्रता सेनानी परिवार से जुड़े दो स्वतंत्रता सेनानी आज तक खुद की आज़ादी का इंतज़ार कर रहे हैं। आज़ादी क्षेत्रवाद से, आज़ादी जातिवाद से और आज़ादी वोटबैंक की राजनीति से। ये दो सेनानी हैं उत्तराखंड में कुमाऊं क्षेत्र के पिथौरागढ़ जनपद से स्व. प्रयाग दत्त पंत और उनके छोटे भाई स्व. बंशीधर पंत। बीडी पांडे लिखित कुमाऊं के इतिहास पर नज़र डालें तो स्व. प्रयाग दत्त पंत को पिथौरागढ़ जनपद (तत्कालीन अल्मोड़ा जनपद की सीमान्त तहसील) के पहले स्वतंत्रता सेनानी के रूप में जाना जाता है। आज़ादी की लड़ाई में पं. गोविंद बल्लभ पंत, पं हरगोविंद पंत और बी. डी. पांडे के समकक्ष रहे प्रयागदत्त पंत को पिथौरागढ़ जिले में गांधीवादी आंदोलन का सूत्रधार माना जाता है। 1898 में ग्राम हल्पाटी में जन्मे प्रयाग दत्त पंत जन्मजात प्रतिभा के धनी थे और यही बात गरीब परिवार में जन्मे प्रयाग को प्रयागराज तक ले गयी। उन्होंने इलाहाबाद में बीए की डिग्री स्वर्ण पदक के साथ हासिल की और जनपद का पहला स्नातक होने का गौरव हासिल किया। इस दौरान राष्ट्रीय नेताओं के संपर्क में आये प्रयाग दत्त पंत ने 1919 में रॉलेट एक्ट के विरोध में हुए आंदोलन से प्रभावित होकर सरकारी नौकरी ना करने और स्वतंत्रता आंदोलन में कूदने का निश्चय किया। उन्होंने 1921 में गांधीजी के असहयोग आंदोलन के संदेश को अपने ओजस्वी विचारों के ज़रिये कुमाऊं के दूरदराज इलाकों के पिछड़े इलाकों में फैलाने का काम किया। 1921 में बागेश्वर में आयोजित कुली-बेगार उन्मूलन आंदोलन में पिथौरागढ़ का प्रतिनिधित्व करने वाले एकमात्र व्यक्ति थे प्रयाग दत्त पंत। लगान बंदी, कर बंदी और विदेशी वस्तुओं के बहिष्कार के लिये लोगों को प्रेरित करने के अपराध में ब्रिटिश हुकूमत ने उन्हें एक वर्ष के कठोर कारावास का दंड दिया। 1922 के अंत में जेल से छूटने के बाद प्रयाग दत्त पंत ने अल्मोड़ा जिला अंतरिम परिषद के सदस्य के नाते शिक्षा दीक्षा में पिछड़े इलाकों को अपनी अमूल्य सेवाएं दीं। उन्होंने 1929 तक अपने समकालीन सहयोगियों के साथ कांग्रेस संगठन का काम किया। देश की स्वतंत्रता की लड़ाई में अपना पूरा जीवन झोंक देने वाले इस सेनानी का स्वास्थ्य दिनों दिन गिरता गया और आज़ादी की सुबह देखे बगैर 1940 में उन्होंने अल्पायु में अपने प्राण त्याग दिये।
प्रयागदत्त पंत जी की असमय मौत के बाद भी सेनानी परिवार का रिश्ता स्वतंत्रता आंदोलन से नहीं टूटा। उनके छोटे भाई बंशीधर पंत बर्मा में जापानी हमले के बाद 1940 में पिथौरागढ़ आ गये और पिथौरागढ़ के सिमलगैर में खादी और सिंगर सिलाई मशीन के पुर्जों की दुकान खोली। उन्होंने अपनी दुकान में तिरंगा झंडा लगा रखा था जिसे हटवाने के लिये अंग्रेज प्रशासन ने उनके पूरे परिवार को प्रताड़ित किया। पिथौरागढ़ तहसील के कांग्रेस संगठन मंत्री की हैसियत से बंशीधर पंत को अगस्त 1942 में जेल भेज दिया गया। परिवार दाने दाने को मोहताज था और दो बच्चे मृत्युशैया पर पड़े थे। उन्हें इस शर्त पर छोड़ा गया कि सत्याग्रह करने पर सरकार को सूचित करना होगा और हाज़िरी लगानी होगी। कुछ दिन पश्चात उनका एक पुत्र चल बसा। 1946 तक बंशीधर पंत ने किसान संगठन का काम किया जिसमें छत्रसिंह आजाद, जगत सिंह चौहान, हरिदत्त शास्त्री और धर्म सिंह जैसे सेनानियों का उन्हें पूरा सहयोग मिला। बंशीधर पंत ने रजवारशाही के खिलाफ किसानों के उल्लेखनीय अहिंसात्मक संघर्ष का नेतृत्व किया और ज़मींदारों की बंदूकें छीन कर मालखाने में जमा करवाईं और भूमिहीनों के हक हकूक के लिये संघर्ष किया।
इसे विडंबना ही कहा जाएगा कि आजादी के इन दोनों परवानों को अपने बलिदानों के एवज़ में पहले यूपी और अब उत्तराखंड की सरकारों से उपेक्षा और तिरस्कार ही मिला है। क्या वजह है कि आज़ादी के 68 साल बाद भी इन दोनों सेनानियों के नाम पर इनके अपने गृह जनपद पिथौरागढ़ में आजतक एक भी सार्वजनिक संस्थान नहीं है ? क्या वजह है कि उत्तराखंड में आये दिन स्वतंत्रता सेनानियों को शिक्षण संस्थाएं, सड़कें और दूसरे सार्वजनिक संस्थान बांट रही हरीश रावत सरकार इन दोनों पंत भाइयों के नाम पर चुप्पी साधे हुए है ? स्व. बंशीधर पंत के सबसे छोटे बेटे और कुमाऊं में सामाजिक-राजनीतिक कार्यकर्ता के तौर पर विख्यात जनार्दन पंत तल्ख लहजे में ये सवाल उठाते हैं। भ्रष्टाचार, मजदूरों के शोषण और कई स्थानीय मुद्दों को लेकर आंदोलन छेड़ चुके जनार्दन पंत इसे सीधे सीधे क्षुद्र राजनीति, जातीय समीकरणों और अल्मोड़ा-पिथौरागढ़ के बीच क्षेत्रवाद से जोड़ कर देखते हैं। पिथौरागढ़ पीजी कॉलेज को स्व. प्रयागदत्त पंत के नाम से जोड़ने की स्वतंत्रता सेनानियों और जनता की बेहद पुरानी मांग को ठुकरा कर एनडी तिवारी सरकार ने जिन स्व. लक्ष्मण सिंह महर के नाम से उसे जोड़ा वो स्व. प्रयागदत्त पंत के आजादी की अलख जगाने के बाद ही स्वतंत्रता संग्राम में आये थे। साफ है कि तिवारी सरकार का ये फैसला जाति विशेष के वोट बैंक और संकीर्ण सोच पर आधारित था और कांग्रेस के तत्कालीन प्रदेश अध्यक्ष हरीश रावत के दबाव में लिया गया था। सेनानी परिवार अब पिथौरागढ़ जिले के नाम को स्व. प्रयागदत्त पंत के नाम पर करने और स्व. बंशीधर पंत के नाम पर गौरंगचौड़ इंटर कॉलेज का नामकरण करने की मांग कर रहा है। जनार्दन पंत बताते हैं कि परिवार के दोनों स्वतंत्रता सेनानियों को उनकी गरिमा के अनुरूप सम्मान दिलाने के लिये वो और उनकी बड़ी बहिन कलावती जोशी लंबे समय से संघर्ष कर रहे हैं और सरकार को भेजे पत्रों और मीडिया के ज़रिये लगातार अपनी मांग रख रहे हैं लेकिन सरकार बीजेपी की हो या कांग्रेस की, किसी ने भी उनकी इन मांगों को गंभीरता से नहीं लिया। जिन सेनानियों के संघर्ष ने आजाद भारत में इन नेताओं को लोकतंत्र की सीढ़ियां चढ़ कर सत्ता का सुख भोगने लायक बनाया, उन्हीं नेताओं की ओर से मिल रही उपेक्षा और उपहास की हद तक तिरस्कार ने सेनानी परिवारों के देशभक्ति के जज्बे को ही चोट नहीं पहुंचायी है बल्कि सियासत के नंगे सच को भी उधेड़ कर रख दिया है। स्व. बंशीधर पंत की बड़ी बेटी कलावती जोशी ने सेनानी परिवार के खोये सम्मान को वापस दिलाने के लिये राज्य सरकार से लेकर केंद्र सरकार की चौखट तक खटखटायी लेकिन दुर्भाग्य से वो जीते जी अपने इस संघर्ष में कामयाब नहीं हो सकीं। 75 साल पूरे कर चुके और अस्वस्थता के शिकार जनार्दन पंत रोष व्यक्त करते हुए कहते हैं कि क्या स्वतंत्रता सेनानियों की अगली पीढ़ी के जीते जी उन्हें ये सम्मान नहीं मिलेगा और क्या सरकार उन्हें इसी तरह अपमानित करती रहेगी। इस पूरे मामले में पिथौरागढ़ जनपद के जनप्रतिनिधियों, बुद्धिजीवियों, सेनानी परिवारों और पत्रकारों की चुप्पी भी उन्हें खलती है। वो कहते हैं कि ये चुप्पी उनके जातीय प्रवंचनाओं में जकड़े होने का प्रमाण है। यही वजह है कि उन्होंने राष्ट्रपति महोदय तक अपनी बात पहुंचाते हुए इस संबंध में ठोस कार्रवाई करने या फिर उन्हें इस अपमान के खिलाफ इच्छा मृत्यु की मंजूरी देने की गुहार लगाई है।

दुर्भाग्य ही है कि जिन सेनानियों ने धर्म, जाति और क्षेत्र से ऊपर उठ कर देश की आजादी में अपना योगदान दिया हो, उन्हें आज के राजनीतिक आका भाषा, धर्म, जाति और क्षेत्र के ही आधार पर इतिहास के पन्नों से गुम करने की साजिश रच रहे हैं। अगर ऐसा होता रहा तो बहुत जल्द इतिहास में उन्हीं लोगों का नाम रह जाएगा जिनकी पीठ पर या तो राजनीतिक सत्ता का हाथ हो या फिर जिनके नाम में किसी खास जाति के वोटबैंक को लुभाने की कुव्वत होगी। इससे ये भी साफ होता है कि जो सरकारें अपने पुरखों के बलिदान को राजनीतिक नफा नुकसान के चश्मे से देख रही हैं उन्होंने उत्तराखंड राज्य के लिये वास्तविक तौर पर संघर्ष करने वाले बलिदानियों और आंदोलनकारियों के साथ कितना न्याय किया होगा।  

        

लोकतंत्र के पर्व में करोड़ों का दांव !

(भूपेश पंत)

बिहार विधानसभा चुनाव के बहाने एक बार फिर चुनावों में होने वाले अंधाधुंध खर्च का मुद्दा गरम है। चुनाव आयोग भले ही विधायकों और सांसदों के चुनावी खर्च की सीमा तय करता हो लेकिन राजनीतिक पार्टियां इस संवैधानिक संस्था के कायदे कानूनों को ठेंगा दिखाने में कभी गुरेज नहीं करतीं। लोकतंत्र में चुनावों को भले ही सरकारों से जनता की अपेक्षाओं और उनके आकलन का अवसर माना जाता हो, लेकिन अब ये चुनाव बड़े पैमाने पर कालेधन को ठिकाने लगाने का ज़रिया बन गये हैं। बिहार में सत्तारूढ़ जेडीयू ने बीजेपी पर चुनाव प्रचार में तीस हजार करोड़ रुपये खर्च करने का आरोप लगाया है जबकि बीजेपी पहले ही जेडीयू पर तीन सौ करोड़ रुपये झोंकने का आरोप लगा चुकी है। कोई इन आंकड़ों पर भरोसा ना भी करे तो भी कई चुनाव देख चुकी देश की आम जनता को ये अप्रत्याशित नहीं लगता। सब जानते हैं कि चुनाव आयोग को दिये गये राजनीतिक दलों के चुनावी खर्च के आंकड़े असलियत के कितने करीब होते हैं।     
पिछले लोकसभा चुनाव और उसके साथ कई राज्यों में हुए विधानसभा चुनावों में सियासी दलों के प्रचार पर अरबों रुपये का खर्च चुनाव आयोग में दर्ज है। प्रचार में रुपये खर्च करने में बीजेपी नंबर एक पर रही जबकि कांग्रेस दूसरे नंबर पर रही। बीजेपी ने कुल 714 करोड़ रुपये खर्च करने का आंकड़ा पेश किया है तो कांग्रेस ने 516 करोड़ रुपये खर्च करने की बात मानी है। आंकड़ों को ही मानें तो एनसीपी ने इन चुनावों पर 51 करोड़ रुपये झोंके जबकि बीएसपी तीस करोड़ और सीपीआई (एम) 19 करोड़ से ज्यादा खर्च नहीं कर पायीं। लेकिन राजनीतिक दलों के इन आंकड़ों पर भरोसा करने की कोई वजह दिखायी नहीं देती। बड़े पैमाने पर काले धन का इस्तेमाल होने के कारण चुनावी खर्च का वास्तविक ब्यौरा मिलना नामुमकिन लगता है। चुनाव में काला धन लगाने का एक अहम ज़रिया बना हुआ है, चुनावी चंदा।
पंचायत चुनावों से लेकर विधानसभाओं और लोकसभा के चुनावों में तय सीमा से कई सौ गुना ज्यादा खर्च होता है, इस बात से कोई इंकार कर ही नहीं सकता। महंगाई बढ़ने के साथ साथ इस खर्च में भी बढ़ोत्तरी होती है। आखिर इतना पैसा सियासी दलों के पास आता कहां से है... जाहिर है चुनावी चंदे से। एसोसिएशन ऑफ डेमोक्रेटिक रिफॉर्म्स की ओर से जारी चुनावी चंदों के आंकड़ों पर नज़र डालें तो यूपीए सरकार के दौरान अप्रैल 2004 से मार्च 2011 तक सात सालों में कांग्रेस पार्टी ने करीब 2009 करोड़ रुपये कमाये। इनमें से साढ़े तेरह फीसदी यानी 272 करोड़ रुपये उसे चंदे से मिले। घोषित तौर पर बीस हज़ार रुपये से ज्यादा का चंदा देने वाले नौ फीसदी से भी कम रहे। बीजेपी ने इन सात सालों में करीब 995 करोड़ रुपये कमाये जिसमें से 820 करोड़ रुपये चंदे के नाम पर जुटाये गये। हैरानी की बात है कि यहां भी बीस हज़ार रुपये से ज्यादा का चंदा देने वाले इनमें से केवल 15 फीसदी रहे। दरअसल बीस हज़ार रुपये से ज्यादा चंदा देने वालों का नाम घोषित करना कानूनन अनिवार्य है और सियासी दल इसी कानून का जम कर दुरुपयोग कर रहे हैं। इन चंदों का एक बड़ा हिस्सा श्वेत-श्याम रूप में उद्योगपतियों और बड़े बड़े ग्रुपों से मिलने वाले राजनीतिक चंदे से आता है। ऐसे में ट्रस्टों के ज़रिये पार्टियों को दिये जाने वाले इस चंदे की घोषित रकम भी उतनी बड़ी नहीं होती जिससे असली चुनावी खर्च को आंका जा सके। कई नेता चुनाव आयोग की ओर से तय सीमा को व्यावहारिक ना मान कर अपने बढ़ते चुनावी खर्च को नैतिकता का जामा पहनाना चाहते हैं।
उत्तराखंड में डेढ़ साल बाद होने वाले विधानसभा चुनावों के लिये भी राजनीतिक पार्टियां कमर कसने लगी हैं। एक ओर सदस्यता अभियान के ज़रिये चंदा जुटाया जा रहा है तो वहीं अपनी अपनी जीत के दावे करके सियासी पार्टियां राजनीतिक चंदों की उगाही के लिये छोटी-बड़ी कंपनियों पर डोरे डाल रही हैं। सूत्रों की मानें तो मोदी लहर के चलते अपनी जीत को लेकर आश्वस्त बीजेपी इस बार राज्य में करोड़ों का दांव खेलने जा रही है। खबर है कि 70 विधानसभा क्षेत्रों से प्रत्येक पर पार्टी कम से कम डेढ़ करोड़ रुपये चुनाव प्रचार पर खर्च करेगी। केंद्र की सत्ता से बाहर होने के बाद कांग्रेस का चुनावी खर्च काफी हद तक राज्य की कांग्रेस सरकार के आर्थिक कौशल पर निर्भर करेगा। हैरानी की बात है कि जो राजनीतिक पार्टियां चुनाव जीतने के लिये करोड़ों रुपया पानी की तरह बहाने को तैयार रहती हैं, वो सत्ता में आने के बाद इससे कई गुना अधिक तो वसूल करती ही होंगी। साफ है कि लोकतंत्र के इन लगातार महंगे हो रहे चुनावी पर्वों की कीमत तो विकास के खोखले दावों से जूझ रही आम जनता ही चुकाती है।

इस कीमत को चुका कर भी जनता जिन सियासी पार्टियों को भरोसे से सत्ता सौंपती हैं उसी जनता के सामने ये पार्टियां झूठ बोलने से बाज नहीं आतीं। 2014 के लोकसभा चुनाव में चुनावी खर्च को लेकर इनका झूठ हाल ही में तब सामने आया जब एसोसिएशन फॉर डेमोक्रेटिक रिफार्म ने 14 राजनीतिक दलों के खर्च का ब्यौरा निकाला। उसमें लगभग सभी पार्टियों और सांसदों की ओर से दी गयी जानकारियों में काफी अंतर मिला। उत्तराखंड के टिहरी से बीजेपी सांसद माला राज्यलक्ष्मी शाह कहती हैं कि पार्टी से उन्हें कुछ नहीं मिला तो बीजेपी उन्हें 15 लाख रुपये देने का दावा कर रही है। बीजेपी के ऐसे 35 सांसदों ने पार्टी के घोषित आंकड़ों से कहीं ज्यादा चुनावी खर्च जाहिर किया है। वैसे बीजेपी के हिसाब से उसने अपने 159 सांसदों को 48.25 करोड़ दिये, जबकि उसके ही 229 सांसद पार्टी से चुनाव खर्च मिलने की बात कह रहे हैं। उधर कांग्रेस के मुताबिक 44 में से सात सांसदों को 2.70 करोड़ रुपये दिये गये जबकि एफिडेविट में उसके 18 सांसद पार्टी फंड से पैसा मिलने का दावा कर रहे हैं। जाहिर है कि सियासत के इस हमाम में सभी नंगे हैं। ये तो सिर्फ़ एक बानगी है जो ये बताने के लिये काफी है कि खुद को हमारा जनप्रतिनिधि बताने वाले  सांसद और विधायक किस तरह हमारी ही जेब काट कर सियासत के ऐश लूट रहे हैं और वो भी बिना शर्मिंदगी के। जनता के पैसे को पार्टी और अपने विकास के लिये पानी की तरह बहाया जा रहा है और लोग बुनियादी सुविधाओं के लिये तरस रहे हैं। कालेधन के मुद्दे पर खुद को संजीदा दिखा रही बीजेपी जितना पैसा चुनाव प्रचार में प्रत्यक्ष और अप्रत्यक्ष रूप से खर्च करेगी, उसका दोगलापन उतना ही ज़ाहिर होता जाएगा। पार्टियों की ओर से प्रचार पर होने वाले खर्च के बंटवारे में मीडिया का भी एक हिस्सा होता है इसलिये बेहतर होगा कि लोग खुद ही विचार करें कि उसे लोकतंत्र की इतनी महंगी कीमत चुकाते रहना है या फिर बढ़ते चुनावी खर्च पर अंकुश लगाने की मुहिम में अपनी भागीदारी निभानी है।