शुक्रवार, 28 दिसंबर 2018

लोकतांत्रिक रामराज्य!

भूपेश पंत

देश की मौजूदा लोकतांत्रिक व्यवस्था रामराज्य की ओर बढ़ रही है। रामायण कालीन कई दृश्य आंखों के आगे साकार होकर इस बात का भरोसा दिला रहे हैं कि देश सही हाथों में है। एक ओर जहां देश को पाप मुक्त बनाने के लिये चल रहे अश्वमेघ का घोड़ा निर्बाध दौड़ कर राजतंत्र की पुनर्स्थापना के लिये आतुर है तो वहीं मामा मारीच स्वर्ण मृग की झलक दिखा कर माता सीता को सम्मोहित करने में लगे हैं। ये वही मृग मरीचिका है जिसका आनंद देश की जनता पिछले कई सालों से ले रही है। श्री राम अब मामा मारीच के भ्रमजाल में फंस चुके हैं और स्वर्ण मृग को पाने की अभिलाषा उन्हें लोकतंत्र रूपी माता सीता से दूर ले आयी है। मारीच के कपट भरे जुमले से भ्रमित लक्ष्मण सुरक्षा रेखा खींच कर मौके पर रिपोर्टिंग के लिये जा चुके हैं। माता सीता घने वन के बीच अपनी कुटिया में नितांत अकेली हैं। अब इंतज़ार है तो बस संन्यासी के रूप में रावण के आने का.....

बिहार: सत्ता की प्यास और सिद्धांतों की लाश!

भूपेश पंत

देश की सियासत के मौजूदा दौर में बिहार का ताज़ा राजनीतिक उलटफेर अप्रत्याशित नहीं लेकिन जेडीयू नेता और सीएम नीतीश कुमार ने सत्ता की चाह में जो राह पकड़ी है उसकी उम्मीद कई राजनीतिक विश्लेषकों ने नहीं की थी. भ्रष्टाचार के खिलाफ़ सिद्धांतों से समझौता ना करते हुए नीतीश कुमार ने जिस तरह अपने कई मूल्यों, विरोधों और सिद्धांतों की बलि चढ़ा दी, उसकी परिणति उनके छठी बार बिहार के मुख्यमंत्री पद की शपथ लेने के रूप में हुई. फर्क है तो इतना कि इस बार बिहार में महागठबंधन की नहीं विकास के नाम पर बीजेपी की बैसाखियों पर चलने वाली नीतीश-मोदी की गठबंधन सरकार बनी है. आरजेडी अध्यक्ष लालू प्रसाद यादव अब भले ही नीतीश को लेकर सार्वजनिक तौैर पर कुनमुनाते रहें लेकिन इस तथाकथित पूर्वनियोजित स्क्रिप्ट को अंजाम तक पहुंचाने में उनका योगदान भी कम नहीं है.

लालू यादव ने कहा कि नीतीश ने छल किया है, क्योंकि तेजस्वी के खिलाफ हुई सीबीआई की कार्रवाई के पीछे उन्हीं का हाथ है. उन्होंने कहा कि मुख्यमंत्री पद से नीतीश का इस्तीफा एक सोची समझी रणनीति के तहत हुआ है. सबकुछ फिक्स था, कब कार्रवाई करनी है और कब तेजस्वी से इस्तीफा मांगना है.

वैसे देखा जाये तो बिहार में लालू परिवार पर लगे भ्रष्टाचार के आरोपों और खासतौर पर उपमुख्यमंत्री रहे तेजस्वी यादव के इस्तीफे की मांग को लेकर नीतीश के अलग राह पकड़ने के कयास लगने लगे थे. तेजस्वी के इस्तीफे को लेकर आरजेडी सुप्रीमो लालू यादव का अड़ियल रुख नीतीश की राह को और भी आसान बना रहा था. नीतीश के पास भ्रष्टाचार पर जीरो टॉलरेंस के अपने सिद्धांत से समझौता करने के अलावा दो ही विकल्प थे. पहला कि वो महागठबंधन को तोड़ कर विधानसभा भंग करने की सिफारिश करते और नयी सरकार के लिये चुनावों का रास्ता साफ करते. इससे जहां उनकी सुशासन बाबू की छवि में ईमानदार और सिद्धांतवादी राजनेता होने का तड़का लगता वहीं बीजेपी से दूरी बनाकर वो अपनी धर्मनिरपेक्ष छवि को भी बरकरार रख पाते. लेकिन नोटबंदी समेत केंद्र की मोदी सरकार के कई फैसलों के लिये उनकी तारीफ कर चुके नीतीश को मोदी लहर पर सवार होना सियासी तौर पर शायद ज्यादा आसान लगा. जाहिर है नीतीश ने बीजेपी के सहयोग से सरकार बनाने का दूसरा विकल्प चुना. राष्ट्रपति चुनाव में एनडीए उम्मीदवार को समर्थन देकर नीतीश ने अपनी राजनीतिक बिसात बिछाने में देर नहीं की. बीजेपी की ओर से सुशील कुमार मोदी पहले ही खुले तौर पर नीतीश को समर्थन का भरोसा दे चुके थे. जाहिर है बिहार का ये सियासी उलटफेर आने वाले दिनों में राज्य की सियासत की एक नयी इबारत गढ़ेगा जिसमें जेडीयू को अपनी साख के रूप में एक बड़ी कीमत अदा करनी होगी.

कांग्रेस उपाध्यक्ष राहुल गांधी ने नीतीश कुमार पर तीखा हमला बोला है. राहुल गांधी ने कहा कि सत्ता के लिए व्यक्ति कुछ भी कर सकता है, कोई नियम नहीं है.

नीतीश कुमार को अपने पाले में खींच करके पीएम नरेंद्र मोदी और बीजेपी अध्यक्ष अमित शाह की जोड़ी ने एक तीर से कई शिकार किये हैं. जहां एक ओर मिशन बिहार की कामयाबी से बीजेपी ने राज्य की सरकार में शामिल होकर विपक्ष मुक्त भारत के अपने एजेंडे को विस्तार दिया है वहीं, राष्ट्रपति और उप राष्ट्रपति चुनाव के बहाने एकजुट होने की कोशिश कर रहे विपक्ष की कमर तोड़ कर रख दी है. दूसरी ओर गुजरात दंगों को लेकर नरेंद्र मोदी की आलोचना करने वाले और बिहार के डीएनए को मुद्दा बना चुके नीतीश को विपक्ष से मौकापरस्त होने का तमगा मिलने से भी बीजेपी को ही सबसे अधिक फायदा है. सरकार में हिस्सादारी करके अगले चुनावों तक अपनी स्थिति और मजबूत बनाने के लिये बीजेपी के पास पूरे तीन साल हैं. बशर्ते इन सालों में नीतीश-मोदी सरकार के आड़ेे कोई और सिद्धांत न आये. सूबे की सियासत में उछले भ्रष्टाचार के मुद्दे को भुनाने में इस बार भी कांग्रेस कमजोर कड़ी बन कर उभरी. राहुल-नीतीश मुलाकातों से ऐसा कोई फार्मूला सामने नहीं आया जो महागठबंधन में बिखराव को रोक पाता. आरजेडी अध्यक्ष लालू यादव और उनके परिवार के दूसरे सदस्यों के खिलाफ भ्रष्टाचार के आरोपों पर सीबीआई और ईडी की कार्रवाई के बीच कांग्रेस अब तक अपना स्टैंड साफ नहीं कर पायी है. उधर नीतीश को निशाना बना कर लालू यादव के बयानों में उनकी ये खीज ही सामने आ रही है कि नीतीश को धर्मनिरपेक्षता के मुद्दे पर राजनीतिक रूप से ब्लैकमेल कर पाने की उनकी उम्मीद धरी की धरी रह गयी.

Congratulations to @NitishKumarji & @SushilModi ji. Looking forward to working together for Bihar’s progress & prosperity. — Narendra Modi (@narendramodi) July 27, 2017

देश में जहां एक ओर आम लोगों के बुनियादी मुद्दे कभी नोटबंदी, कभी जीएसटी तो कभी देशभक्ति के तूफान में कम से कम हाशिये पर टिके रहने की जद्दोजहद कर रहे हैं, वहीं येन केन प्रकारेण सत्ता हासिल करने की बीजेपी की मुहिम रंग लाती दिख रही है. मीडिया से लेकर सियासत तक अपने वर्चस्व को कायम रखने की ये कोशिश कभी देश में एकछत्र राज कर चुकी कांग्रेस की याद दिलाती है. और ये भी याद दिलाती है कि सत्तारूढ़ दल की नीयत ही उसकी नियति का निर्धारण करती है. लोकतंत्र, संविधान और राजधर्म की रक्षा के लिये देश में एक मजबूत विपक्ष का होना आज भी उतना ही ज़रूरी है जितना आपातकाल के दौरान था. विपक्ष अगर बीजेपी के इस वार से जल्द उबर नहीं पाया तो देश आने वाले समय में एक और निरंकुश सरकार के निजाम का गवाह बन सकता है. सच है कि आसमान की ओर फैंका जाने वाला पत्थर उतनी ही तेजी से नीचे भी आता है. कांग्रेस के इतिहास से सबक लें तो लगता है कि गुरुत्वाकर्षण का ये वैज्ञानिक नियम सियासी दलों पर भी लागू होता है. और एक सच ये भी है कि लोकतंत्र में जनता का वोट ही इस गुरुत्वाकर्षण बल की तीव्रता का पैमाना होता है, जिसे कई बार बेवकूफ बनाया जा सकता है लेकिन सबको नहीं और हर बार नहीं.
Posted by: News Trust of India 27/07/2017

चीन पर निगाहें, नेहरु पर निशाना!

"जो समाज अपने इतिहास के नायकों का सम्मान नहीं करता उसकी कोख से सिर्फ खलनायक ही जन्म लेते हैं."
भूपेश पंत

सोशल मीडिया पर इन दिनों चीन को लेकर एक अलग तरह का आक्रोश देखने को मिल रहा है. दिलचस्प बात ये है कि आभासी दुनिया के देशभक्त रणबांकुरे चीन के मौज़ूदा आक्रामक तेवरों को देश के पहले प्रधानमंत्री स्व. जवाहरलाल नेहरु की चीन नीति और 1962 के युद्ध में मिली हार से जोड़ते हुए उनके मान मर्दन से भी परहेज़ नहीं करते. वे लोग भूल रहे हैं कि इतिहास की स्वस्थ समीक्षा के लिये उस दौर से जुड़े हर पहलू पर ध्यान देने की जरूरत होती है. पूर्वाग्रह और संकीर्ण मानासिकता से की गयी आलोचना आने वाली पीढ़ियों के सामने इतिहास का केवल एकांगी और विकृत चेहरा ही पेश करेगी

स्वस्थ आलोचना करना हमारा लोकतान्त्रिक अधिकार है लेकिन किसी की मृत्यु के बाद उसकी कुछ (सामूहिक) विफलताओं की आड़ लेकर उसके महत्वपूर्ण योगदान को नकारना भारतीय संस्कार नहीँ है और ना ही देशभक्ति का परिचायक. जो समाज अपने इतिहास के नायकों का सम्मान नहीं करता उसकी कोख से सिर्फ खलनायक ही जन्म लेते हैं. नेहरु, गाँधी या देश की आज़ादी से लेकर उसके विकास में शामिल लोगों से कई मामलों में इत्तफ़ाक न रखने के बावजूद मैं उनकी सकारात्मक भूमिका को नकार नहीं सकता. मेरा मानना है कि बुतों को तोड़ना तालिबानी कृत्य है और बुत केवल हथौड़े से नहीँ तोड़े जाते.

चलते चलते एक कहानी….

एक बार प्रधानमंत्री पंडित नेहरू दौरे पर एक गाँव में पहुंचे. वहां लोगों की भीड़ ने उन्हें घेर लिया और वो उनसे उनकी समस्याएं सुनने लगे. तभी अचानक भीड़ से एक बूढ़ी महिला सामने आयी और पंडित नेहरू का गिरेबान पकड़ कर गुस्से से बोली कि मैंने देश की आज़ादी की लड़ाई में अपने दोनों बच्चे खो दिए और बदले में मुझे क्या मिला? पंडित नेहरू उसके हाथों को अपने हाथ में लेकर शांत स्वर में बोले माताजी आपको ये अधिकार मिला है कि आप अपने प्रधानमंत्री का गिरेबान पकड़ कर उससे ये सवाल पूछ सकती हो.

आइये पंडित नेहरू और आज़ादी की लड़ाई में शहीद हुए तमाम जाने अनजाने लोगों को याद करें और लोकतंत्र के इस सबसे बड़े अधिकार को भी जिसे हमें हर हाल में सुरक्षित रखना है. जय हिंद .

Posted by: News Trust of India 07/07/2017

माँ

माँ... इस शब्द में पूरी सृष्टि समाई है...
माँ हमेशा माँ रहती है
उसकी ममता
अपने पराये का भेद कहाँ करती है
वो तो सबके लिए समान रूप से बरसती है...
कसूर तो उस बंजर ज़मीन का है
जो चार बूंदों के लिए तरसती है
माँ एक शाश्वत सत्य है, समर्पण है
जो कभी अधिकार नहीं जताती है
रिश्तों के स्वार्थी संसार में
शायद इसीलिए
वो घर के एक कोने में
मौन खड़ी नज़र आती है....

मंगलवार, 20 अक्टूबर 2015

जड़ों से जुड़ो अभियान

जड़ों से जुड़ो अभियान पर आपकी प्रतिक्रियाएं




एक जनांदोलन की मौत

भूपेश पंत

लड़ भिड़ कर उत्तराखंड के लोगों ने अलग राज्य की अपनी मांग मनवा ही ली। इस मांग को लेकर हुए जनांदोलन को इक्कीस साल बीत गये और राज्य मिले पंद्रह साल। यूपी के पर्वतीय इलाके की उपेक्षा और योजनाओं में पहाड़ की अनदेखी के आक्रोश से जन्मा था ये जनआंदोलन। हर क्षेत्र में पिछड़े इस पर्वतीय इलाके के लोगों का गुस्सा भड़काने का काम किया आरक्षण के मुद्दे ने। लोग आरक्षण के विरोधी नहीं थे लेकिन भौगोलिक आधार पर अपने पिछड़े होने के बावजूद जातीय आधार पर अवसरों में कटौती का अहसास उन्हें सड़कों पर उतार लाया और देखते देखते ये आंदोलन अलग राज्य की मांग में तब्दील हो गया। क्या छात्र, क्या महिलाएं, क्या कर्मचारी और क्या कारोबारी, अपने अस्तित्व को बचाने की इस जद्दोजहद में हर कोई भागीदार था। राजनीतिक दलों ने आंदोलन की आंच में सियासी रोटियां सेंकनी शुरू कीं लेकिन जनता के इस आंदोलन की कमान ना तो कोई सियासी दल अपने हाथ में ले पाया और ना ही कोई नेता। तत्कालीन यूपी सरकार का दमनचक्र भी चरम पर था। खटीमा, मसूरी, नैनीताल, मुजफ्फरनगर से लेकर दिल्ली तक खून के छींटे भी उड़े और आंदोलन की तपिश भी महसूस की गयी। सड़कों पर उतरा हर व्यक्ति अलग राज्य के निर्माण में अपनी भागीदारी निभा रहा था। भागीदार वो भी थे जो अपने घरों, मोहल्लों और गांवों में पुलिसिया गिरफ्त से बच कर पहुंचे अनजाने चेहरों को छत और खाना मुहैया करा रहे थे। भागीदार वो लोग भी थे जिन्होंने आंदोलन की कामयाबी की दुआएं मांगीं।

इस जन आंदोलन ने उत्तराखंड को बहुत कुछ दिया। अपमान, पीड़ा, शहादत, उत्पीड़न और बलात्कार की नींव पर उत्तराखंड राज्य का निर्माण हुआ और साथ ही मिली आंदोलन से उभरे नेताओं की नयी फौज। ये वो लोग थे जिनमें उत्तराखंड राज्य को लेकर भावनाओं का ज्वार था, कुछ सपने थे और व्यवस्था के प्रति एक आक्रोश था। सियासत में अधपके ये लोग सियासी दलों के खांटी नेताओं के लिये बहुत बड़ा खतरा थे जो नये राज्य के निर्माण में अपने लिये नयी संभावनाएं तलाश रहे थे। जो नेता जन आंदोलन की अगुवाई तक नहीं कर पाये वही नये राज्य की सियासत के सबसे बड़े सूबेदार बन कर अगली पंक्ति में जा खड़े हुए। नेताओं और नौकरशाहों के चमकते चेहरे अपनी सियासी और माली हालत में सुधार की पूरी गुंजाइश देख रहे थे। खतरा था तो बस उन नौजवानों और जागरूक बुद्धिजीवियों से, जो अपने सपनों के नये राज्य में पहाड़ के सुलगते सवालों का हल तलाश रहे थे। बस यहीं से शुरू हुई आंदोलन में भागीदारी के रिटर्न गिफ्ट बांटने की सियासत। नवोदित पर्वतीय राज्य के सियासी आकाओं ने आंदोलन से जुड़े लोगों को सहूलियतों, रियायतों, प्रमाणपत्रों और नौकरियों का झुनझुना दिखाना शुरू किया। ये वो सियासी दांव था जो और किसी भी नवोदित राज्य में नहीं चला गया। लोगों को भी लगा कि अगर सरकार उनके त्याग और बलिदान की कीमत चुका रही है तो इसमें बुरा क्या है। आंदोलनकारियों के चिह्नीकरण के नाम पर लोगों को खेमों में बांट दिया गया। अपने अपने लोगों को आंदोलनकारी घोषित करने की औपचारिकता शुरू हुई। आंदोलन के दौरान मारे गये शहीदों के नाम पर स्मारक बना कर औपचारिकता पूरी कर दी गयी। सोचा ये जाना था कि नये राज्य के पुराने मुद्दों का हल कैसे मिले, पहाड़ की दुश्वारियां कैसे दूर हों और विकास के सपनों को कैसे साकार किया जाये। लेकिन आंदोलन की कोख से जन्मे आंदोलनकारी अपनी ऊर्जा इस बात पर खर्च करने लगे कि आंदोलन में भागीदारी की ज्यादा से ज्यादा कीमत उन्हें कैसे मिले और दूसरों को कैसे नहीं। पहाड़ के वास्तविक मुद्दों को पेंशन की रकम, चिह्नीकरण में आ रही दिक्कत, सम्मान पाने की होड़ और रियायतों की झड़ी से ढक दिया गया। जुझारू लोगों को सुविधाभोगी बनाने की साजिश रची गयी। वो आंदोलनकारी जो नये राज्य के बेहतर निर्माण में नींव के पत्थर बन सकते थे उन्हें एक ऐसे ढांचे के कंगूरे बना कर सजा दिया गया जिसकी नींव में भ्रष्टाचार, ऐय्याशी, शराब माफिया, खनन माफिया, भू माफिया और अपराध जैसी दीमकें आज भी रेंग रही हैं। सियासी दलों को अपने इस दांव से राहत भी मिली और रोजगार भी। कुछ आंदोलनकारी आज भी राज्य के मुद्दों को लेकर छिटपुट लड़ाई लड़ रहे हैं लेकिन स्वार्थों की सियासत न तो उन्हें एकजुट होने दे रही है और न ही मजबूत। राज्य आंदोलनकारियों के नाम पर हो रही सियासत का ये एक ऐसा भद्दा चेहरा है जो लोगों के त्याग और कुर्बानियों को सरकारी पलड़े में तोल कर उसकी बोली लगा रहा है। हैरानी की बात तो ये है कि सियासत के इस मकड़जाल में फंसे लोग खुद आगे बढ़ चढ़ कर अपनी बोली लगा रहे हैं। जैसे कि वो आंदोलन में कूदे ही थे ये सब पाने के लिये। ये जनांदोलन और उससे जुड़े सपनों की मौत नहीं तो और क्या है?    


सियासत का 'स्थाई' दांव

सब तैयार, क्यों चुप सरकार

भूपेश पंत

(पहाड़ के नाम पर जम कर सुर्खियां बटोर रहे मुख्यमंत्री हरीश रावत गैरसैंण को स्थायी राजधानी बनाने के मुद्दे पर खामोश हैं। उधर गैरसैंण और देहरादून में नयी विधानसभाएं बनाने का फैसला लोगों की उलझन और बढ़ा रहा है। गैरसैंण में विधानसभा सत्र चला कर उसे ग्रीष्मकालीन राजधानी के तौर पर स्थापित किया जा रहा है। लोग कह रहे हैं कि पर्वतीय राज्य में शीतकालीन राजधानी का औचित्य तो फिर भी समझ में आता है लेकिन सरकार जैसे कुछ समझने को तैयार नहीं है। मगर सियासत में जो होता है वो दिखता नहीं और जो नहीं दिखता वही होता है। ज़ाहिर है हरीश रावत भी ये कहावत जानते हैं कि बंद मुट्ठी लाख की, खुल गयी तो खाक की।)  
   
गैरसैंण पर घमासान जारी है। दनादन विधानसभा के सत्र गैरसैंण के लोगों को तोहफे में दिये जा रहे हैं। रावत सरकार अचानक पहाड़-पहाड़ चिल्लाने लगी है। कांग्रेस के भीतर से ही गैरसैंण को स्थायी राजधानी बनाने की मांग मुखर हो चुकी है। फिलहाल ग्रीष्मकालीन राजधानी और विधानसभा सत्र के नाम पर वहां विधानसभा भवन और दूसरे स्थायी निर्माण कार्य चल रहे हैं। कांग्रेस पर राजनीति करने का आरोप लगा रही बीजेपी खुद गैरसैंण को स्थायी राजधानी बनाने की सियासत में जुटी है। सोशल मीडिया से लेकर संगठनों के बीच वैचारिक और राजनीतिक स्तर पर गैरसैंण का मुद्दा गरमाया हुआ है। उत्तराखंड के क्षेत्रीय दल यूकेडी ने इस मुद्दे पर गैरसैंण विधानसभा सत्र के घेराव का एलान कर दिया है। पूरा माहौल ऐसा बन गया है जैसे पहाड़ के पैरोकार गुफाओं से निकल निकल कर बाहर आ रहे हों। सेनाएं सज चुकी हैं। सैनिक टूट पड़ने को आतुर हैं लेकिन किस पर ये नहीं पता। जब सभी लोग गैरसैंण के पक्ष में खड़े हैं तो आखिर ये लोग लड़ेंगे भी किससे।
गैरसैंण को पर्वतीय राज्य उत्तराखंड की स्थायी राजधानी बनाने का मुद्दा उत्तराखंड राज्य की मांग के समय से ही उठता आया है। खुद को राज्य और राजधानी की सियासत का झंडाबरदार मानने वाला यूकेडी इस मुद्दे पर अपना हक जताता आया है। लेकिन वक्त के साथ बिखर चुके इस क्षेत्रीय दल की खिसकती राजनीतिक ज़मीन ने इस मुद्दे को बीजेपी और कांग्रेस की सियासत का खिलौना बना कर रख दिया। राज्य निर्माण के साथ देहरादून को अस्थायी राजधानी बनाने के फैसले ने गैरसैंण को वो सियासी मोहरा बना दिया जिसका इस्तेमाल ये दोनों पार्टियां बारी बारी से करती आयी हैं और आज भी कर रही हैं। पहाड़ के वास्तविक मुद्दों को लेकर बहस छिड़ी नहीं कि गैरसैंण का जिन्न बोतल से बाहर निकाल दिया जाता है। रोजगार, पलायन, शिक्षा, स्वास्थ्य, बिजली-पानी, सड़क, विकास योजनाओं में नेताओं और नौकरशाहों की बंदरबांट जैसे मुद्दे गैरसैंण के बोझ तले दबा दिये जाते हैं। दरअसल राज्य गठन के बाद से ही स्थायी राजधानी के मुद्दे पर सियासी दल संजीदा नहीं रहे। बुनियादी ढांचे और सुविधाओं के नाम पर देहरादून को भले ही अस्थायी राजधानी का नाम दिया गया हो लेकिन यहां हुए स्थायी निर्माण कार्य नेताओं और नौकरशाहों की मंशा बताने के लिये काफी हैं। बीजेपी की स्वामी सरकार ने स्थायी राजधानी तय करने के लिये जिस दीक्षित आयोग का गठन किया, उसने भी देहरादून को ही स्थायी राजधानी के लिये सबसे उपयुक्त ठहरा दिया। आठ साल तक जो दीक्षित आयोग राजधानी तलाशने के नाम पर लोगों का पैसा फूंकता रहा उसकी रिपोर्ट इस आयोग के गठन के औचित्य पर ही सवाल खड़े करती है। साफ है कि आयोग ने जानते बूझते पहाड़ की जनता की भावनाओं के साथ खिलवाड़ किया और गैरसैंण पर देहरादून को तवज्जो दी। इसके लिये कौशिक समिति की रिपोर्ट को भी खारिज कर दिया गया जो उत्तराखंड को अलग राज्य बनाने के साथ साथ गैरसैंण को स्थायी राजधानी बनाने का सुझाव केंद्र की तत्कालीन बीजेपी सरकार को दे चुका था। केंद्र ने अलग पर्वतीय राज्य का गठन कर उसका श्रेय तो ले लिया लेकिन राजधानी का मुद्दा राज्य सरकार पर छोड़ कर एक नया सियासी खेल शुरू करवा दिया। पहाड़ के लोग पिछले पंद्रह सालों से उस मुद्दे पर उलझे हैं जिसका पहाड़ की वास्तविक समस्याओं से कोई लेना देना नहीं है। भला कौन इस बात को मानेगा कि सिर्फ़ गैरसैंण को स्थायी राजधानी बना देने से ये समस्याएं खत्म हो जाएंगी। उत्तराखंड की पहाड़ी जनता को राज्य के मुद्दे पर ठगने वालों में नेता ही नहीं नौकरशाह भी शामिल हैं। इनमें से ज्यादातर लोग ना तो पहाड़ से जुड़ाव रखते हैं और ना ही पहाड़ चढ़ने में उनकी दिलचस्पी है। मैदानी इलाकों में कैंप कार्यालयों से चल रहा पहाड़ का शासन-प्रशासन इस बात का सबसे बड़ा सबूत है। नैनीताल हाई कोर्ट के सख्त रवैये के बावजूद नौकरशाहों की कार्यप्रणाली में कोई अंतर आया हो, ऐसा लगता तो नहीं है। इन चंद सुविधाभोगी नौकरशाहों ने पर्वतीय राज्य की मूल भावना को भटकाने में कोई कसर नहीं छोड़ी है।

गैरसैंण फिर सियासत का मोहरा बना मौजूदा कांग्रेस सरकार के पूर्व मुख्यमंत्री विजय बहुगुणा के कार्यकाल में। पार्टी की अंदरूनी सियासत और खेमेबाजी झेल रहे बहुगुणा ने तुरुप के इक्के की तरह विधानसभा का सत्र बुला कर गैरसैंण का सियासी इस्तेमाल शुरू किया। इसका मकसद खुद को पहाड़ का एकमात्र पैरौकार बना कर अपनी कुर्सी बचाना था। कुर्सी तो बची नहीं लेकिन जाते जाते मौजूदा मुख्यमंत्री हरीश रावत को एक सियासी हथियार ज़रूर पकड़ा गये। इस बार सूबे के मुखिया हरीश रावत गैरसैंण पर बड़ा दांव खेलने की तैयारी करते दिखायी दे रहे हैं। वैसे तो विधानसभा सत्र के संयुक्त अधिवेशन में महामहिम राष्ट्रपति प्रणब मुखर्जी के अभिभाषण में गैरसैंण को ग्रीष्मकालीन राजधानी बनाने का जिक्र हो चुका है। लेकिन लगता है कि सरकार अब गैरसैंण के फल को सड़ने की हद तक नहीं टाले रखना चाहती। पहाड़ को लेकर बड़ी बड़ी घोषणाएं कर रहे हरीश रावत फिलहाल सियासी नफा नुकसान का आकलन कर रहे हैं और अपने परिवार के राजनीतिक भविष्य की चिंता भी। दरअसल अब सारी लड़ाई पहाड़ की स्थायी राजधानी के बहाने पहाड़ियों की भावनाओं को भुनाने पर केंद्रित हो गयी है। रावत जी को मालूम है कि गैरसैंण राजधानी बनने के साथ ही उसके आसपास के इलाकों की ज़मीनें सोना उगलने लगेंगी। पहाड़ के लोगों को यही सब्जबाग दिखा कर उन्हें करोड़पति बनाने के सपने दिखाये जा रहे हैं। लेकिन लोग ये भूल रहे हैं कि करोड़ों कमाने के लिये उन्हें अपनी ज़मीनें बेचनी पड़ेंगी। यानी वो ना तो घर के रहेंगे और ना पहाड़ के। सरकार स्थायी निर्माण के नाम पर जो अधिग्रहण करेगी उसकी नीति अब तक तैयार नहीं है। कुल मिला कर गैरसैंण का मुद्दा गरमा कर सरकार विकास योजनाओं की ज़मीनी हकीकत से लोगों का ध्यान बंटा रही है और कुछ हद तक उसमें कामयाब भी होती दिख रही है। कांग्रेस नेताओं के लगातार आ रहे बयान इसे और हवा दे रहे हैं। पूर्व सांसद प्रदीप टम्टा पहले ही कह चुके हैं कि रावत गैरसैंण को स्थायी राजधानी बना कर इतिहास में अपना नाम दर्ज करा सकते हैं। प्रदेश कांग्रेस 2 नवंबर से शुरू हो रहे विधानसभा सत्र से पहले गैरसैंण में बैठक कर उसे स्थायी राजधानी बनाने का प्रस्ताव पास कराने की सोच रही है। सियासी मजबूरी के चलते सरकार गैरसैंण को स्थायी राजधानी बनाने की दिशा में कदम तो बढ़ा रही है लेकिन फूंक फूंक कर। फैसले के लिये उसे सही मौके का इंतज़ार है जिसमें एक महीना भी लग सकता है और एक साल भी। लेकिन पार्टियों और जन संगठनों में इसका श्रेय लेने की होड़ अभी से शुरू हो चुकी है।



पहाड़ की पाती


(अजय ढौंडियाल का विशेष लेख)

मेरे प्यारे बच्चो,
           मैं तुम्हारी मां, पहाड़। ये पाती लिखते हुए मेरे आंखें भरी हुई हैं। तुम्हारी ये बहदाल मां तुम्हारी खुशी और सलामती की दुआ कर रही है। 15 साल हो चुके हैं उस परिवार (उत्तर प्रदेश) से अलग हुए, जहां तुम्हारे और मेरे साथ हमेशा सौतेला व्यवहार होता था। तब सब भरपेट भोजन करते थे और मैं तुम्हें आधे पेट सुलाती थी। वहां से अलग होते वक्त मैं बहुत खुश थी। कितनी लड़ाई लड़ी थी तुमने मेरे खातिर। अपने कई बच्चे मैंने उस लड़ाई में खो दिए। आज सोचती हूं कि आखिर क्या मिला? सपना देखा था कि तुम्हें एक छोटे से घर में खुशहाल रखूंगी, दो जून की रोटी तुम्हें घर में दूंगी, तुम्हें अब कभी भटकना नहीं पड़ेगा। लेकिन सारे सपने टूटे कांच की तरह बिखर गए। उस सौतेले कुनबे से अलग होने और हक की लड़ाई लड़ने में सफेद कुर्ते और टोपी पहने तुम्हारे जो कुछ भाई तुम्हारे पीछे चल रहे थे वो आज मुझे ही सौतेला मानने लगे हैं। बिल्कुल अलग-थलग छोड़ दिया है उन्होंने मुझे और तुम्हारे दूसरे भाई-बहनों को। वो सब आज नेता बन गए हैं। ठीक उसी तरह के नेता जैसे तुम्हारे पुराने घर (उत्तर प्रदेश) में हुआ करते थे। अपनों के ही दुश्मन, सिर्फ स्वार्थी। अपने ही घर में सौतेली बना दी गई हूं मैं। मेरे दूध का कर्ज चुकाने की बजाए ये मेरी ही छाती में सियासत की रोटियां सेंक रहे हैं। मेरे खेत हथियाकर इन्होंने परदेस के धन्ना सेठों को बेच डाले हैं। जिस आंगन में तुम खेला करते थे, उन पर बिल्डरों का कब्जा हो रहा है। गांव के नीचे वाले गधेरे याद हैं ना, वहां आज खनन माफिया का राज है। ऐसा कभी न होता अगर तुम मेरे पास होते।
नेता बन चुके तुम्हारे इन सौतेले भाइयों ने तुम्हारे ही सामने ढेरों वादे किए थे मुझसे। वादा घर-आंगन के विकास का, वादा मेरे नाती-पोतों की अच्छी परवरिश और तालीम का, उन्हें घर-गांव में ही रोजगार दिलाने का, तुम्हारी बीमार मां और भाई-बहनों के इलाज का। 15 साल हो गए हैं। सौतेलेपन से तंग आकर तुम्हारे कई और भाई-बहन गांव छोड़कर चले गए हैं। कूड़ी-पुंगड़ियां लगातार बंजर हो रही हैं। मल्या खोळा, तल्लि बाखळि में बस दो-तीन भाई-बंधु बचे हैं तुम्हारे। जितना हो पाता है वे करते हैं। 8-10 पुंगड़ियों में कोदा-झंगोरा बो पाते हैं, बाकी सब बंजर। अब इन बांजी पुंगड़ियों पर भू-माफिया की गिद्ध नजर टिकी हुई है। सफेद गाड़ियों में दनदनाते हुए आते रहते हैं। मल्या और पल्या गांव में तो इन्हीं में से कुछ ने पॉलीफॉर्म बना दिए हैं। पार गांव के तुम्हारे गिंदी दादा ने अपने सभी सेरे बेच दिए हैं तल्ले मुलुक के एक बनिए को। वो अब सेरों में ऑर्गेनिक फार्मिंग कर रहा है। सल्ट में तुम्हारे रणु भाई ने तल्ली सारी के सभी खेतों में फूल उगाने शुरू कर दिए हैं। महीने में 5 लाख तक कमाता है बल। दिल्ली से एक भल्ला जी आए थे रानीखेत। उन्होंने तो जरा से रुपये देकर गांव वालों से 500 नाली जमीन खरीद ली और अब वहां मेडिसिनल प्लांट लगा रहे हैं। बोल रहे थे कि लाखों का माल पैदा करेंगे महीने में। अमेरिका से पढ़कर लौट आया है सकणीधार (पौड़ी) का एकलव्य रावत। वही रावत जी का लड़का जो दिल्ली में डायरेक्टर हैं। सकणीधार में उसने अपनी बांजी पुंगड़ियों में लिंबा के पेड़ लगा दिए हैं। 250 पेड़ लिंबों से गज्ज भरे हुए हैं। नजीबावाद मंडी से दिल्ली मंडी तक बेच रहा है वो लिंबा। दिल्ली की कंपनी में काम करने वाला जखमोला जी का जेठा लड़का भी कुमाल्डी गांव लौट आया परार। उसने मुर्गी और बकरी पालन का काम शुरू किया था। 10 बकरी ली थी पहले, अब 200 हो गई हैं।
मेरे बच्चो, आओ लौट आओ। मेरी खातिर न सही, अपने खुद के लिए आओ। परदेस में रहने वाले दूसरे लोग तुम्हारी पुंगड़ियां हथिया कर अच्छी-खासी आमदनी कर रहे हैं। तुम परदेस में दिनरात मेहनत कर रहे हो, मेरे नाती पोतों के लिए भी वक्त नहीं मिलता तुमको वहां। बीमारियों के अलग शिकार हो रहे हो। यहां देखो, क्या नहीं है हमारे पास। तुम तो हमेशा से मेहनती हो, फिर सोना उगा सकते हो। आओ, आबाद करो दोबारा अपनी धरती को। मेरी ये पाती पाते ही जवाब जरूर देना। अपनी मजबूरी लिखना, अपनी पीड़ा लिखना, मेरी नाती-पोतों के बारे में भी लिखना। तुमको मेरे पास आने से कौन रोकता है ये जरूर बताना....


तुम्हारी मां  



जड़ों से जु़ड़ो

मेरा गांव, मेरा पहाड़
(भूपेश पंत)


पहाड़ का शांत जीवन, स्वच्छ हवा, नैसर्गिक सुंदरता, सीढ़ीदार खेत, जीवन की रफ्तार को नियंत्रित करते सर्पीले मोड़ और दूर किसी रेडियो में गूंजता पहाड़ी गीत। इन सब को छोड़ कर भला कौन शहरों की आपाधापी से भरी ज़िंदगी जीना चाहेगा। रोजगार और सुविधाओं की तलाश में पलायन एक ज़रूरत बन कर सामने आता है। बड़े शहरों और महानगरों की भीड़ में खोकर पहाड़ के लोग धीरे-धीरे अपनी जड़ों से कट जाते हैं। कभी-कभी तो इतना कि ना तो उन्हें अपने गांव का पता मालूम रहता है और ना ही वहां रहने वाले रिश्तेदारों के नाम। पहाड़ की जिस खूबसूरती को महसूस करने देश विदेश से सैलानी यहां आते हैं, वो अपने भीतर एक गहरी उदासी पाले हुए है। पहाड़ आने वालों में अपनों के चेहरे की तलाश मायूसी को और बढ़ा देती है। हर सुबह सूनी आंखों से रास्ता देखते गांव शाम होते होते थक कर सो जाते हैं। पहाड़ के कई लोग अपनी जड़ों से दूर देश विदेश जाकर काबिल हो गये हैं। गांवों को इंतज़ार है कि उनके ये काबिल लोग अपनी जेबों में विकास की किरणें भर कर लौटेंगे तो पहाड़ के चेहरे पर कुछ रौनक लौट पाएगी। सूनी गलियां खिलखिला उठेंगी और मन आत्मविश्वास से भर उठेगा।
कल ही एक मित्र के ज़रिये पहाड़ के एक नौजवान से मुलाकात हुई। मन सुखद आश्चर्य से भर उठा। अपनी सारी पढ़ाई यूएस और दूसरे देशों में करने वाला ये युवक विदेशों में नौकरी ढूंढने की बजाय गांव लौट चुका है। पहाड़ में बागवानी और रोजगार के दूसरे विकल्पों को लेकर अपनी सोच के साथ। पहाड़ में ऐसे दर्जनों उदाहरण मिल जाएंगे। अपनी ज़िंदगी का लंबा हिस्सा पहाड़ के बाहर बिता चुके लोग वापस आने के नाम पर भले ही तराई से आगे ना बढ़ पाए हों, लेकिन कई नौजवान आज भी अपनी जड़ों से जुड़ने की कशमकश में लगे हैं। राजसत्ता एक्सप्रेस से जुड़ी टीम अपने आप में इसका सबसे बड़ा सुबूत है। हमारी टीम ने जड़ों से जुड़ो अभियान के ज़रिये प्रवासी उत्तराखंडियों को सामाजिक, आर्थिक और वैचारिक तौर पर पहाड़ से जोड़ने की मुहिम शुरू की है। राजसत्ता एक्सप्रेस इस अभियान के ज़रिये ना केवल पहाड़ का संदेश बाहर जा बसे अपने लोगों तक पहुंचाएगा बल्कि पहाड़ के विकास के लिये बनायी जा रही सरकारी नीतियों में उनके सार्थक हस्तक्षेप का वाहक भी बनेगा। हमारी कोशिश होगी आपके विचारों, समस्याओं और व्यावहारिक सुझावों के आधार पर सरकार को आईना दिखाने की। ताकि पहाड़ की सड़कें आपको डरायें नहीं, आधी अधूरी बुनियादी सुविधाएं मुंह चिढ़ाएं नहीं।
हमें और आपको मिल कर इस पर्वतीय राज्य को अपने सपनों का उत्तराखंड बनाना है। कब तक हम सरकारी उपेक्षा का रोना रोते रहेंगे। निराशा और विकल्पहीनता की स्थिति से ऊपर उठ कर पहाड़ के विकास को सियासी एजेंडे में सबसे ऊपर लाना है। इसके लिये सभी पर्वतीय लोगों को एकजुट होना होगा। धर्म, जाति और क्षेत्र की दीवारें तोड़नी होंगी और अपना अहं भी छोड़ना होगा। खेती, बागवानी, पशुपालन, पर्यटन, सौर ऊर्जा, शिक्षा, स्वास्थ्य जैसे तमाम क्षेत्रों में करने को बहुत कुछ किया जा सकता है। हम चाहते हैं कि सरकार पर्वतीय मूल के नौजवानों का पलायन रोकने और बाहर जा चुके युवाओं को वापस लाने के लिये प्रोत्साहन नीति बनाये। हमारे जो लोग बाहर अच्छा काम कर रहे हैं वो अपने गांवों तक कुछ आर्थिक मदद पहुंचाएं। कई गैर सरकारी संगठन और उत्तराखंड के प्रवासियों के बीच काम कर रहे मंच इस दिशा में महत्वपूर्ण योगदान दे सकते हैं। हमारी अपील है कि वे लोग और संगठन आगे आयें, हमारी इस मुहिम का हिस्सा बनें और सोशल मीडिया तथा ई मेल के ज़रिये इस संबंध में अपने विचारों से हमें ज़रूर अवगत कराएं। हमें उम्मीद है कि फेसबुक पर हमारे अभियान के पेज जड़ों से जुड़ो के ज़रिये आप अपनी बात आसानी से हम तक पहुंचा पाएंगे।
आपके प्यार और सहयोग का आकांक्षी

राजसत्ता एक्सप्रेस परिवार



मजबूर नहीं मजबूत विपक्ष चाहिये


(भूपेश पंत)

उत्तराखंड के विधानसभा चुनावों में डेढ़ साल का समय बचा है लेकिन सूबे की सरकार के कामकाज को लेकर विपक्षी बीजेपी के हमलों में धार अब भी नहीं आ रही है। राज्य की कांग्रेस सरकार शिक्षकों और चिकित्सकों को पहाड़ चढ़ाने में नाकाम रही है। आपदा के ढाई साल बाद भी कई जगहों पर मरम्मत का काम धरातल पर दिखायी नहीं दे रहा है। सरकार विकास योजनाओं की गठरी पीठ पर लादे पहाड़ की ओर मुंह कर एक ही जगह पर खड़ी दौड़ लगा रही है, लेकिन जो इन विकास कार्यों को गांवों तक पहुंचाने का दबाव बना सके ऐसा विपक्ष सीन से ही नदारद है। बीजेपी पहाड़ की वास्तविक समस्याओं को आंदोलन का रूप देने में नाकाम रही है। लगता है कि या तो बीजेपी में इस बार अपनी सरकार को लेकर हद से ज्यादा भरोसा है और वो पहाड़ के बेकार मुद्दों में उलझना नहीं चाहती, या फिर उसके पास इन समस्याओं का समाधान है ही नहीं। दूसरी बात ज्यादा तर्क संगत लगती है क्योंकि राज्य में वो पहले दो बार सरकार बना चुकी है और उस दौरान भी पहाड़ को लेकर कोई ठोस कार्ययोजना बनती नज़र नहीं आयी। मुख्यमंत्री के बहिष्कार, कुछ धरने प्रदर्शनों और ज्ञापनों के ज़रिये महज़ विरोध की औपचारिकता निभा रही बीजेपी का ये रवैया पहाड़ का अहित कर रहा है।
विपक्ष का काम सरकार पर जनहित के कार्यों के लिये दबाव बनाना, लोगों की समस्याओं और मुद्दों को हल करवाना और प्रक्रियागत खामियों पर सरकार का ध्यान खींचना होता है। लेकिन सूबे की मौजूदा सरकार की घोषणाएं बयां करती हैं कि उस पर कम से कम विपक्ष का दबाव तो नहीं है। अलबत्ता सरकार छोटे छोटे जन संगठनों की ओर से उठायी जा रही पहाड़ी गांवों के विकास की मांग से ज़रूर प्रभावित नज़र आ रही है। सरकार मंत्रियों, विधायकों और नौकरशाहों को गांवों की पथरीली ज़मीन पर उतारने जा रही है। इसके अलावा खेती और संस्कृति को बचाने के झुनझुने भी बजाये जा रहे हैं। पहाड़ के विकास की योजनाएं कितनी ईमानदारी से धरातल पर उतर पाएंगी इसे देखने की ज़िम्मेदारी राज्य की एकमात्र विपक्षी पार्टी के कंधों पर है लेकिन लगता है कि केंद्र की मोदीमय सत्ता की हवा ने उसे मदहोश कर दिया है। पार्टी बीजेपी विधायकों के साथ दुर्व्यवहार को लेकर रावत सरकार पर लोकतंत्र की हत्या करने का आरोप लगा रही है। लेकिन बतौर विपक्ष खुद लोकतंत्र को मजबूत करने में कितनी कामयाब रही है बीजेपी को ये भी पर्वतीय राज्य की जनता को बताना चाहिये। पार्टी ने सीडी कांड की सीबीआई जांच, आबकारी घोटाला, आपदा घोटाला और खनन घोटाले जैसे मुद्दे उठाए तो ज़रूर लेकिन ना तो वो इन पर सरकार को घेर पायी और ना ही पहाड़ के बुनियादी सवालों को हल करवा पायी। कांग्रेस सरकार के पूरे कार्यकाल में विपक्ष घोटाले ही घोटाले तलाशता रहा लेकिन उसकी आक्रामकता मुद्दों के हल से कहीं ज्यादा लूट में हिस्सा ना बंटा पाने की खिसियाहट में तब्दील होती ही नज़र आयी। मौजूदा सरकार के मुखिया हरीश रावत ने विधानसभा में जब धमकी भरे अंदाज में सबकी पोल खोलने का दांव फेंका तो न जाने क्यों विपक्ष से एक भी आवाज़ इस चुनौती को कबूल करने के लिये नहीं उठी। मुख्यमंत्री का ये बयान लोकतंत्र का कितना बड़ा उपहास था, ये बात ना तो विपक्ष को समझ में आयी और ना ही राज्य के तथाकथित जन संगठनों को। जनता के प्रति अपनी जवाबदेही को लेकर सरकार और विपक्ष कितना संजीदा है ये घटना उसे बयान करने के लिये काफी है।    
ऐसा नहीं है कि सरकार ने विपक्ष को मुद्दे थमाने में कोई कोताही बरती हो। कभी मुख्यमंत्री नौकरशाहों की मनमर्जी का रोना रोते नज़र आते हैं तो कभी गैरसैंण को ग्रीष्मकालीन राजधानी बनाने का मुद्दा गरमाते हैं। पलायन के कारण वीरान होते गांव हों या आपदा राहत के नाम पर चल रही बंदरबांट, शिक्षा  स्वास्थ्य और पेयजल से जुड़े मसले हों या पहाड़ से जुड़ी लोकलुभावन घोषणाएं, विपक्ष के पास व्यावहारिकता और भ्रष्टाचार को लेकर सरकार को टोकने का मौका हमेशा रहता है। लेकिन राष्ट्रीय पार्टी होने के अलावा और कौन सी ऐसी सियासी मजबूरी है जिसने बीजेपी के पर्वतीय जनप्रतिनिधियों को मुखर होने से रोक रखा है। नेता प्रतिपक्ष भले ही इन आरोपों से इंकार करें लेकिन सच तो ये है कि बीजेपी ने सदन के भीतर और बाहर जिन कुछ मुद्दों पर सरकार को घेरा भी उनका जन सरोकारों से कोई सीधा रिश्ता है ही नहीं। किसी भी राज्य के लिये विधानसभा सत्र बेहद अहम होता है जबकि विधायक अपने अपने क्षेत्रों की समस्याओं को उठा पाते हैं। लेकिन हर बार सदन के पटल पर रखे गये सवाल हंगामे की भेंट चढ़ जाते हैं। विपक्ष की कमजोर रणनीति हर बार सरकार को बच निकलने का मौका ही देती रही है।
पहाड़ की जनता को इस मामले में उत्तराखंड क्रांति दल से भी निराश ही हाथ लगी है। पार्टी के एकमात्र विधायक कैबिनेट मंत्री के रूप में कांग्रेस की गोद में जा बैठे हैं और संगठन के पांव तले जैसे ज़मीन ही गायब है। गुटों में बंट कर अपनी पहचान खो चुकी यूकेडी अगर पहाड़ की जनता के मुद्दों को आक्रामकता से उठाती तो शायद उनके दिलों में कुछ जगह भी बना पाती। लेकिन खुद को बचाने की कशमकश में ही उलझी ये क्षेत्रीय पार्टी कभी इन मुद्दों की तरफ लौट भी पाएगी ऐसी उम्मीद करना फिलहाल बेमानी लगता है। पहाड़ की अस्मिता के संघर्ष में जुटे छोटे छोटे राजनीतिक और गैर राजनीतिक संगठन स्थानीय स्तर पर इन समस्याओं के लिये संघर्ष कर रहे हैं लेकिन उन्हें एक सूत्र में पिरो सके ऐसी कोई राजनीतिक शक्ति उभर पाएगी इसे लेकर भी संदेह बना हुआ है। पहाड़ के इस तरह बंटे होने का सियासी लाभ हमेशा की तरह कभी कांग्रेस तो कभी बीजेपी उठाती आयी हैं, इसलिये सत्ता और विपक्ष के बीच की सियासत नूराकुश्ती से ज्यादा नहीं रह गयी है।