शुक्रवार, 28 दिसंबर 2018

और लगाओ दरबार !


भूपेश पंत

जनता की समस्याओं को सुनने के लिये राजा ने दरबार लगाने की मुनादी क्या करवाई, अनपढ़, गंवार और लाचार लोगों ने तो जैसे लोकतंत्र की स्थापना का जश्न ही मनाना शुरू कर दिया। वो ये भूल गयी कि राजा आज भी राजा ही है। समय समय पर लोगों के लिये दरबार लगाना दरअसल उसकी इसी प्रभुसत्ता को सार्वजनिक रूप से स्थापित करने की सतत प्रक्रिया है। राजा अगर खुश हुआ तो फ़रियादी पर ईनामों की झड़ी लगा दे और अगर कोई उसकी सत्ता को चुनौती देने का दुस्साहस करे तो भरे दरबार में उसका सिर भी कलम करा सकता है। इससे पूरे राज्य को ये संदेश और बेहतर तरीके से जाता है कि राजा से बगावत करने वालों का यही अंजाम होगा।
राज्य के विकास की बाट जोह रही प्रजा को इतनी समझ कहां कि वो अपनी लक्ष्मण रेखा के भीतर रह सके। वो तो राजतंत्र के भीतर लोकतंत्र के प्रस्फुटित होने का जश्न मनाने में जुटी है। इस जोश में कोई लाचार फ़रियादी अपनी मर्यादा ही भूल जाये तो इसमें राजा का क्या दोष। आखिर वो राजा है जो कभी भी गुस्से में आ सकता है क्योंकि उसके लिये मर्यादा की सीमा रेखा वही है जो उसने अपने लिये तय की है। लेकिन फ़रियादी को ये नहीं भूलना चाहिये कि वो राजा के दरबार में जा रहा है और वहां के कुछ नियम कायदे होते हैं। फ़रियादी कितना भी क्षुब्ध क्यों ना हो उसे राजा के सामने तेज आवाज में बात करने की इजाज़त नहीं है। रीढ़ की हड्डी को दोहरा किये बिना राजा से आंखें मिला कर बात करना बग़ावत की श्रेणी में आता है।
राजा फ़रियादी की समस्या का समाधान करने का आश्वासन दे या न दे, उसे झुक कर और मुस्कराते हुए उल्टे पाँव राजा को इस तरह दुआएं देते हुए जाना होगा कि राजा के दर्शन कर पाना ही उसके लिये सौभाग्य की बात है। राज्य के अधिकारियों के भ्रष्टाचार की कोई शिकायत सहन नहीं की जायेगी और इसे सामने लाने वाले किसी भी मामले में राजा जीरो टॉलरेंस अपनाते हुए तत्काल फ़रियादी की गिरफ़्तारी का हुक्म दे सकता है। जो फ़रियादी किसी वजह से दरबार में अपनी बात ना कह पाये उसे राजा की मुस्कुराहट को ही सत्ता का आशीर्वाद समझ कर धन्य हो लेना चाहिए। और खबरदार जो किसी फ़रियादी ने दरबार में अपनी जान लेने की कोशिश भी की तो, क्योंकि प्रजा की जान पर राजा का हक है और उसे निकालने के लिये उसकी अपनी व्यवस्था है। फ़रियादी के इस दुस्साहस को राजा के इस सिस्टम के नाकारेपन के तौर पर लिया जा सकता है लिहाजा ये राजद्रोह माना जाएगा।
गार्ड ऑफ ऑनर दे दे कर जिन जनसेवकों को मौन साधे जन प्रतिनिधि और जननायक बनाए जा रहे हो और लोकतंत्र को दरबार तंत्र बनाने पर तुले हो तो फिर झेलो ना दरबार के नियम कायदे भी। बात करते हैं….।
Posted by: News Trust of India 30/06/2018

लोकतंत्र हमारा, मीडिया तुम्हारा!


भूपेश पंत

देश में अगले आम चुनाव के लिये सियासी ऊंट करवटें लेने की तैयारी कर रहा है और लोकतंत्र के चौथे खंभे यानी मीडिया ने हर दल का अपने अपने तरीके से सियासी मूल्यांकन करना भी शुरू कर दिया है। उनकी गिद्ध दृष्टि केंद्र और विपक्ष के सियासी नफा नुकसान के लिहाज़ से ज़मीन पर रेंग रहे मुद्दों पर झपट्टा मारने के लिये बेताब है। लेकिन मुझे कोई ये बताये कि ये कैसा लोकतंत्र है जहां किसी संभावित गठबंधन की आलोचना मीडिया के एक हिस्से में इस बात के लिये हो रही है कि उसका नेता अभी तय क्यों नहीं है। भारतीय लोकतंत्र किसी भी राजनीतिक पद के लिये सबको समान अवसर की भावना को स्थापित करता है लेकिन सच तो ये है कि देश की ज्यादातर पार्टियों का आंतरिक लोकतंत्र इस भावना से कोसों दूर नजर आता है। कहीं पार्टी के उच्च पदों पर एक ही परिवार का कब्जा है तो कहीं एक परिवार से जुड़े व्यक्ति पर ही पूरी पार्टी की चुनावी नैया पार लगाने का दारोमदार है।
ऐसे में राजनीतिक पार्टियों की इस लोकतंत्र विरोधी मानसिकता का समान रूप से विरोध करने की बजाय जब मीडिया का एक तबका सियासी हाथों में खेलते हुए एक लोकतांत्रिक प्रक्रिया पर ही सवाल उठाने लगता है तो हैरानी होती है। आखिर क्यों आज ही ये तय हो जाना चाहिये कि अमुक गठबंधन के जीतने पर कौन किस पद पर आसीन होगा। मीडिया को ये जानने में क्यों दिलचस्पी है कि भानुमती के कुनबे की भानुमती कौन होगी। आखिर इसके जरिये देश के मतदाताओं को मीडिया का ये तबका कौन सा संदेश देने की कोशिश कर रहा है। क्या वो अपनी टीआरपी बढ़ाने के लिये चुनाव से पहले किसी मुद्दे को स्थापित करने की फिराक में हैं भले ही इसके लिये लोकतांत्रिक व्यवस्था को ताक पर क्यों ना रखा जाये या फिर किसी के सियासी फायदे के लिये खुद को हथियार बनाने की कोशिश है। नफा नुकसान के भंवर में फंसे मीडिया का ये तबका शायद कामयाबी के शॉर्टकट का सफ़र तय कर रहा है लेकिन ऐसा करके क्या वो कहीं ना कहीं देश की लोकतांत्रिक व्यवस्था को खोखला नहीं कर रहा है।
कोई भी सियासी दल किसी भी चुनाव में अपने विरोधियों पर तरह तरह के राजनीतिक आरोप लगाता है जो कभी साबित नहीं होते। सियासी जंग में जुमलों का इस्तेमाल भी अब कोई नयी बात तो नहीं है। लेकिन चुनावी राजनीति में कोई भी दल अपनी संवैधानिक और लोकतांत्रिक मर्यादा को पार ना करे ये तय करने की जिम्मेदारी मीडिया की भी है। ऐसे में अगर मीडिया का कोई हिस्सा जाने अनजाने इस लोकतंत्र विरोधी सियासी मुद्दे को चटखारे ले लेकर आगे बढ़ाता है तो वो पत्रकारिता के ही नहीं लोकतांत्रिक मूल्यों के पतन में भी बराबर का हिस्सेदार है।
मेरा मानना है कि निष्पक्ष होना बेहद मुश्किल है। इस प्रक्रिया में अकसर खून के आंसू रोने पड़ते हैं और जहर के घूँट पीने पड़ते हैं। कभी कभी तो अंतरात्मा की आवाज़ को भी अनसुना करना पड़ता है। ज़ाहिर है ऐसे में निष्पक्षता का दावा करने वाले तथाकथित मीडिया को किस दर्द से गुजरना पड़ता होगा ये मैं कुछ हद तक समझ सकता हूँ। लेकिन इस दर्द से आराम पाना चाहें तो वो इस देश के संविधान, लोकतांत्रिक सिद्धांतों, जनता के हितों और सच के पक्ष में खड़े होकर पा सकते हैं। वर्ना हो सकता है उनकी वजह से पूरी मीडिया बिरादरी ही आने वाले समय में ये विकल्प पूरी तरह से खो दे।
Posted by: News Trust of India 22/06/2018

पिक्चर अभी बाकी है….!




भूपेश पंत

अगले साल होने वाले आम चुनाव के लिए बीजेपी की ओर से बिसात बिछनी शुरू हो गई है। मेरा मानना है कि जम्मू कश्मीर में सरकार को गिराने का यह फैसला दोनों दलों की नूरा कुश्ती से अधिक कुछ नहीं है और इससे होने वाला राजनीतिक ध्रुवीकरण अगले आम चुनाव और जम्मू कश्मीर के विधानसभा चुनाव में दोनों दलों के लिए काफी अहम साबित होगा।
बीजेपी की साफ मंशा अगले 1 साल में राज्यपाल शासन के दौरान आतंकवाद और इसके जरिए राष्ट्रवाद को मुद्दा बनाकर अगला आम चुनाव लड़ने की है। राज्य में हालात इतने बिगड़ चुके हैं कि कोई भी दूसरा राजनीतिक दल नई गठबंधन सरकार के गठन के जरिए राज्य में लोकतांत्रिक व्यवस्था को बनाए रखने और उससे होने वाले राजनीतिक नुकसान का जोखिम नहीं लेना चाहता। लिहाजा जम्मू कश्मीर में हर राजनीतिक दल इस वक्त गवर्नर के शासन को एक मात्र विकल्प मान रहा है। बीजेपी भी यही चाहती थी कि गवर्नर के शासन के जरिए राज्य की कमान केंद्र के हाथों में आ जाए। बीजेपी ने जिस तरह महबूबा मुफ्ती की पीडीपी के साथ इस तलाक को अंजाम दिया उसकी नाटकीयता पर्दे के पीछे के किसी खेल को उजागर करने की हिमायत जरूर करती है।
फैसले के वक्त को देखें तो जम्मू कश्मीर की आवाम के लोकतांत्रिक हितों को ताक पर रख कर लिया गया यह फैसला राजनीतिक महत्वाकांक्षाओं से प्रेरित लगता है। क्या कारण है कि रमजान में सीजफायर के जिस फैसले को इसकी एक अहम वजह बताया जा रहा है उसे लेने से पहले ही सरकार से अलग होने का फैसला नहीं लिया गया। सोशल मीडिया में सरकार के इस फैसले की काफी आलोचना हो रही थी। लेकिन अगर यह फैसला तब ले लिया गया होता तो बीजेपी पर पूरी तरह से मुस्लिम विरोध का ठप्पा लग जाता। उसने जहां एक और इस एक महीने के मौके को बढ़ती पत्थरबाजी और आतंकवादी घटनाओं के जरिए अपने वोट बैंक में राष्ट्रवाद को उत्प्रेरित करने के लिए इस्तेमाल किया वही मुस्लिम वोट बैंक को भी लुभाने की कोशिश की।
इस एक महीने के अंतराल ने दोनों दलों को यह मानने के लिये तैयार कर दिया कि इस वक्त साथ छोड़ना सियासी तौर पर सबसे मुफीद होगा। यही वजह है कि इस फैसले के बाद बीजेपी ने सरकार में शामिल रहने के बावजूद इसका ठीकरा पीडीपी पर फोड़ा तो दूसरी ओर महबूबा मुफ्ती ने भी धारा 370 को बरकरार रखने समेत अपनी पार्टी की सरकार की उपलब्धियां गिनाने में देर नहीं की।
जाहिर है बीजेपी को लगता है कि जम्मू कश्मीर के मौजूदा और आने वाले घटनाक्रमों का लाभ अगले आम चुनाव में पूरे देश में उसे मिल सकता है जबकि पीडीपी खुद को सीजफायर और जम्मू कश्मीर की आवाम की हिमायती बताते हुए अगले आम चुनाव में बहुमत की अपील के साथ इसका राजनीतिक फायदा उठाने की कोशिश करेगी। यानी इस एक राजनीतिक दांव से दोनों ही दलों ने अपने पाप धोने की कोशिश की है। सियासी शतरंज पर इस बिसात को उसी दिन बिछा दिया गया था जब यह बेमेल गठबंधन सामने आया था। आज इस नाटक का अंत हो गया। लेकिन पर्दा अभी गिरा नहीं है… पिक्चर अभी बाकी है मेरे दोस्त।
Posted by: News Trust of India 19/06/2018

चौकीदार!

चौकीदार ने कहा चौकीदार क्यों हो
लुटे घर के तुम, पहरेदार क्यों हो।
पांच साल पर जिसे ले लिया मैंने
तुम आज भी उसके ठेकेदार क्यों हो।
जो खेल भीड़ का चल रहा है आज
चौरासी से उसके जिम्मेदार क्यों हो।
परिवार छोड़ कर भी परिवार का हूं
तुम एक परिवार की सरकार क्यों हो।
चुनाव में अब न चलेगी तुम्हारी पसंद
पसंद को लेकर तुम्हीं गद्दार क्यों हो।
चार साल में मैं बना पेड़ बबूल का
तुम आज भी इतने हवादार क्यों हो।
मैं जीत के भी क्यों भुला दिया गया
तुम हार के भी बने यादगार क्यूं हो।
मेरी फ़ितरत है जो वो छोड़ूंगा नहीं
गले मिलने को तुम तैयार क्यों हो।
मैंने चुका दिये थे तेरे कर्ज तो सभी
तुम आज भी मेरे कर्जदार क्यों हो।
काश देख पाते मेरे हाथों का कमाल
आंख की हरकत पर शर्मसार क्यों हो।
कुत्ते ने कहा आज सरेआम मुझसे
तुम किसी और के वफादार क्यों हो।

- भूपेश पंत 

लोकतांत्रिक रामराज्य!

भूपेश पंत

देश की मौजूदा लोकतांत्रिक व्यवस्था रामराज्य की ओर बढ़ रही है। रामायण कालीन कई दृश्य आंखों के आगे साकार होकर इस बात का भरोसा दिला रहे हैं कि देश सही हाथों में है। एक ओर जहां देश को पाप मुक्त बनाने के लिये चल रहे अश्वमेघ का घोड़ा निर्बाध दौड़ कर राजतंत्र की पुनर्स्थापना के लिये आतुर है तो वहीं मामा मारीच स्वर्ण मृग की झलक दिखा कर माता सीता को सम्मोहित करने में लगे हैं। ये वही मृग मरीचिका है जिसका आनंद देश की जनता पिछले कई सालों से ले रही है। श्री राम अब मामा मारीच के भ्रमजाल में फंस चुके हैं और स्वर्ण मृग को पाने की अभिलाषा उन्हें लोकतंत्र रूपी माता सीता से दूर ले आयी है। मारीच के कपट भरे जुमले से भ्रमित लक्ष्मण सुरक्षा रेखा खींच कर मौके पर रिपोर्टिंग के लिये जा चुके हैं। माता सीता घने वन के बीच अपनी कुटिया में नितांत अकेली हैं। अब इंतज़ार है तो बस संन्यासी के रूप में रावण के आने का.....

बिहार: सत्ता की प्यास और सिद्धांतों की लाश!

भूपेश पंत

देश की सियासत के मौजूदा दौर में बिहार का ताज़ा राजनीतिक उलटफेर अप्रत्याशित नहीं लेकिन जेडीयू नेता और सीएम नीतीश कुमार ने सत्ता की चाह में जो राह पकड़ी है उसकी उम्मीद कई राजनीतिक विश्लेषकों ने नहीं की थी. भ्रष्टाचार के खिलाफ़ सिद्धांतों से समझौता ना करते हुए नीतीश कुमार ने जिस तरह अपने कई मूल्यों, विरोधों और सिद्धांतों की बलि चढ़ा दी, उसकी परिणति उनके छठी बार बिहार के मुख्यमंत्री पद की शपथ लेने के रूप में हुई. फर्क है तो इतना कि इस बार बिहार में महागठबंधन की नहीं विकास के नाम पर बीजेपी की बैसाखियों पर चलने वाली नीतीश-मोदी की गठबंधन सरकार बनी है. आरजेडी अध्यक्ष लालू प्रसाद यादव अब भले ही नीतीश को लेकर सार्वजनिक तौैर पर कुनमुनाते रहें लेकिन इस तथाकथित पूर्वनियोजित स्क्रिप्ट को अंजाम तक पहुंचाने में उनका योगदान भी कम नहीं है.

लालू यादव ने कहा कि नीतीश ने छल किया है, क्योंकि तेजस्वी के खिलाफ हुई सीबीआई की कार्रवाई के पीछे उन्हीं का हाथ है. उन्होंने कहा कि मुख्यमंत्री पद से नीतीश का इस्तीफा एक सोची समझी रणनीति के तहत हुआ है. सबकुछ फिक्स था, कब कार्रवाई करनी है और कब तेजस्वी से इस्तीफा मांगना है.

वैसे देखा जाये तो बिहार में लालू परिवार पर लगे भ्रष्टाचार के आरोपों और खासतौर पर उपमुख्यमंत्री रहे तेजस्वी यादव के इस्तीफे की मांग को लेकर नीतीश के अलग राह पकड़ने के कयास लगने लगे थे. तेजस्वी के इस्तीफे को लेकर आरजेडी सुप्रीमो लालू यादव का अड़ियल रुख नीतीश की राह को और भी आसान बना रहा था. नीतीश के पास भ्रष्टाचार पर जीरो टॉलरेंस के अपने सिद्धांत से समझौता करने के अलावा दो ही विकल्प थे. पहला कि वो महागठबंधन को तोड़ कर विधानसभा भंग करने की सिफारिश करते और नयी सरकार के लिये चुनावों का रास्ता साफ करते. इससे जहां उनकी सुशासन बाबू की छवि में ईमानदार और सिद्धांतवादी राजनेता होने का तड़का लगता वहीं बीजेपी से दूरी बनाकर वो अपनी धर्मनिरपेक्ष छवि को भी बरकरार रख पाते. लेकिन नोटबंदी समेत केंद्र की मोदी सरकार के कई फैसलों के लिये उनकी तारीफ कर चुके नीतीश को मोदी लहर पर सवार होना सियासी तौर पर शायद ज्यादा आसान लगा. जाहिर है नीतीश ने बीजेपी के सहयोग से सरकार बनाने का दूसरा विकल्प चुना. राष्ट्रपति चुनाव में एनडीए उम्मीदवार को समर्थन देकर नीतीश ने अपनी राजनीतिक बिसात बिछाने में देर नहीं की. बीजेपी की ओर से सुशील कुमार मोदी पहले ही खुले तौर पर नीतीश को समर्थन का भरोसा दे चुके थे. जाहिर है बिहार का ये सियासी उलटफेर आने वाले दिनों में राज्य की सियासत की एक नयी इबारत गढ़ेगा जिसमें जेडीयू को अपनी साख के रूप में एक बड़ी कीमत अदा करनी होगी.

कांग्रेस उपाध्यक्ष राहुल गांधी ने नीतीश कुमार पर तीखा हमला बोला है. राहुल गांधी ने कहा कि सत्ता के लिए व्यक्ति कुछ भी कर सकता है, कोई नियम नहीं है.

नीतीश कुमार को अपने पाले में खींच करके पीएम नरेंद्र मोदी और बीजेपी अध्यक्ष अमित शाह की जोड़ी ने एक तीर से कई शिकार किये हैं. जहां एक ओर मिशन बिहार की कामयाबी से बीजेपी ने राज्य की सरकार में शामिल होकर विपक्ष मुक्त भारत के अपने एजेंडे को विस्तार दिया है वहीं, राष्ट्रपति और उप राष्ट्रपति चुनाव के बहाने एकजुट होने की कोशिश कर रहे विपक्ष की कमर तोड़ कर रख दी है. दूसरी ओर गुजरात दंगों को लेकर नरेंद्र मोदी की आलोचना करने वाले और बिहार के डीएनए को मुद्दा बना चुके नीतीश को विपक्ष से मौकापरस्त होने का तमगा मिलने से भी बीजेपी को ही सबसे अधिक फायदा है. सरकार में हिस्सादारी करके अगले चुनावों तक अपनी स्थिति और मजबूत बनाने के लिये बीजेपी के पास पूरे तीन साल हैं. बशर्ते इन सालों में नीतीश-मोदी सरकार के आड़ेे कोई और सिद्धांत न आये. सूबे की सियासत में उछले भ्रष्टाचार के मुद्दे को भुनाने में इस बार भी कांग्रेस कमजोर कड़ी बन कर उभरी. राहुल-नीतीश मुलाकातों से ऐसा कोई फार्मूला सामने नहीं आया जो महागठबंधन में बिखराव को रोक पाता. आरजेडी अध्यक्ष लालू यादव और उनके परिवार के दूसरे सदस्यों के खिलाफ भ्रष्टाचार के आरोपों पर सीबीआई और ईडी की कार्रवाई के बीच कांग्रेस अब तक अपना स्टैंड साफ नहीं कर पायी है. उधर नीतीश को निशाना बना कर लालू यादव के बयानों में उनकी ये खीज ही सामने आ रही है कि नीतीश को धर्मनिरपेक्षता के मुद्दे पर राजनीतिक रूप से ब्लैकमेल कर पाने की उनकी उम्मीद धरी की धरी रह गयी.

Congratulations to @NitishKumarji & @SushilModi ji. Looking forward to working together for Bihar’s progress & prosperity. — Narendra Modi (@narendramodi) July 27, 2017

देश में जहां एक ओर आम लोगों के बुनियादी मुद्दे कभी नोटबंदी, कभी जीएसटी तो कभी देशभक्ति के तूफान में कम से कम हाशिये पर टिके रहने की जद्दोजहद कर रहे हैं, वहीं येन केन प्रकारेण सत्ता हासिल करने की बीजेपी की मुहिम रंग लाती दिख रही है. मीडिया से लेकर सियासत तक अपने वर्चस्व को कायम रखने की ये कोशिश कभी देश में एकछत्र राज कर चुकी कांग्रेस की याद दिलाती है. और ये भी याद दिलाती है कि सत्तारूढ़ दल की नीयत ही उसकी नियति का निर्धारण करती है. लोकतंत्र, संविधान और राजधर्म की रक्षा के लिये देश में एक मजबूत विपक्ष का होना आज भी उतना ही ज़रूरी है जितना आपातकाल के दौरान था. विपक्ष अगर बीजेपी के इस वार से जल्द उबर नहीं पाया तो देश आने वाले समय में एक और निरंकुश सरकार के निजाम का गवाह बन सकता है. सच है कि आसमान की ओर फैंका जाने वाला पत्थर उतनी ही तेजी से नीचे भी आता है. कांग्रेस के इतिहास से सबक लें तो लगता है कि गुरुत्वाकर्षण का ये वैज्ञानिक नियम सियासी दलों पर भी लागू होता है. और एक सच ये भी है कि लोकतंत्र में जनता का वोट ही इस गुरुत्वाकर्षण बल की तीव्रता का पैमाना होता है, जिसे कई बार बेवकूफ बनाया जा सकता है लेकिन सबको नहीं और हर बार नहीं.
Posted by: News Trust of India 27/07/2017

चीन पर निगाहें, नेहरु पर निशाना!

"जो समाज अपने इतिहास के नायकों का सम्मान नहीं करता उसकी कोख से सिर्फ खलनायक ही जन्म लेते हैं."
भूपेश पंत

सोशल मीडिया पर इन दिनों चीन को लेकर एक अलग तरह का आक्रोश देखने को मिल रहा है. दिलचस्प बात ये है कि आभासी दुनिया के देशभक्त रणबांकुरे चीन के मौज़ूदा आक्रामक तेवरों को देश के पहले प्रधानमंत्री स्व. जवाहरलाल नेहरु की चीन नीति और 1962 के युद्ध में मिली हार से जोड़ते हुए उनके मान मर्दन से भी परहेज़ नहीं करते. वे लोग भूल रहे हैं कि इतिहास की स्वस्थ समीक्षा के लिये उस दौर से जुड़े हर पहलू पर ध्यान देने की जरूरत होती है. पूर्वाग्रह और संकीर्ण मानासिकता से की गयी आलोचना आने वाली पीढ़ियों के सामने इतिहास का केवल एकांगी और विकृत चेहरा ही पेश करेगी

स्वस्थ आलोचना करना हमारा लोकतान्त्रिक अधिकार है लेकिन किसी की मृत्यु के बाद उसकी कुछ (सामूहिक) विफलताओं की आड़ लेकर उसके महत्वपूर्ण योगदान को नकारना भारतीय संस्कार नहीँ है और ना ही देशभक्ति का परिचायक. जो समाज अपने इतिहास के नायकों का सम्मान नहीं करता उसकी कोख से सिर्फ खलनायक ही जन्म लेते हैं. नेहरु, गाँधी या देश की आज़ादी से लेकर उसके विकास में शामिल लोगों से कई मामलों में इत्तफ़ाक न रखने के बावजूद मैं उनकी सकारात्मक भूमिका को नकार नहीं सकता. मेरा मानना है कि बुतों को तोड़ना तालिबानी कृत्य है और बुत केवल हथौड़े से नहीँ तोड़े जाते.

चलते चलते एक कहानी….

एक बार प्रधानमंत्री पंडित नेहरू दौरे पर एक गाँव में पहुंचे. वहां लोगों की भीड़ ने उन्हें घेर लिया और वो उनसे उनकी समस्याएं सुनने लगे. तभी अचानक भीड़ से एक बूढ़ी महिला सामने आयी और पंडित नेहरू का गिरेबान पकड़ कर गुस्से से बोली कि मैंने देश की आज़ादी की लड़ाई में अपने दोनों बच्चे खो दिए और बदले में मुझे क्या मिला? पंडित नेहरू उसके हाथों को अपने हाथ में लेकर शांत स्वर में बोले माताजी आपको ये अधिकार मिला है कि आप अपने प्रधानमंत्री का गिरेबान पकड़ कर उससे ये सवाल पूछ सकती हो.

आइये पंडित नेहरू और आज़ादी की लड़ाई में शहीद हुए तमाम जाने अनजाने लोगों को याद करें और लोकतंत्र के इस सबसे बड़े अधिकार को भी जिसे हमें हर हाल में सुरक्षित रखना है. जय हिंद .

Posted by: News Trust of India 07/07/2017

माँ

माँ... इस शब्द में पूरी सृष्टि समाई है...
माँ हमेशा माँ रहती है
उसकी ममता
अपने पराये का भेद कहाँ करती है
वो तो सबके लिए समान रूप से बरसती है...
कसूर तो उस बंजर ज़मीन का है
जो चार बूंदों के लिए तरसती है
माँ एक शाश्वत सत्य है, समर्पण है
जो कभी अधिकार नहीं जताती है
रिश्तों के स्वार्थी संसार में
शायद इसीलिए
वो घर के एक कोने में
मौन खड़ी नज़र आती है....

मंगलवार, 20 अक्टूबर 2015

जड़ों से जुड़ो अभियान

जड़ों से जुड़ो अभियान पर आपकी प्रतिक्रियाएं




एक जनांदोलन की मौत

भूपेश पंत

लड़ भिड़ कर उत्तराखंड के लोगों ने अलग राज्य की अपनी मांग मनवा ही ली। इस मांग को लेकर हुए जनांदोलन को इक्कीस साल बीत गये और राज्य मिले पंद्रह साल। यूपी के पर्वतीय इलाके की उपेक्षा और योजनाओं में पहाड़ की अनदेखी के आक्रोश से जन्मा था ये जनआंदोलन। हर क्षेत्र में पिछड़े इस पर्वतीय इलाके के लोगों का गुस्सा भड़काने का काम किया आरक्षण के मुद्दे ने। लोग आरक्षण के विरोधी नहीं थे लेकिन भौगोलिक आधार पर अपने पिछड़े होने के बावजूद जातीय आधार पर अवसरों में कटौती का अहसास उन्हें सड़कों पर उतार लाया और देखते देखते ये आंदोलन अलग राज्य की मांग में तब्दील हो गया। क्या छात्र, क्या महिलाएं, क्या कर्मचारी और क्या कारोबारी, अपने अस्तित्व को बचाने की इस जद्दोजहद में हर कोई भागीदार था। राजनीतिक दलों ने आंदोलन की आंच में सियासी रोटियां सेंकनी शुरू कीं लेकिन जनता के इस आंदोलन की कमान ना तो कोई सियासी दल अपने हाथ में ले पाया और ना ही कोई नेता। तत्कालीन यूपी सरकार का दमनचक्र भी चरम पर था। खटीमा, मसूरी, नैनीताल, मुजफ्फरनगर से लेकर दिल्ली तक खून के छींटे भी उड़े और आंदोलन की तपिश भी महसूस की गयी। सड़कों पर उतरा हर व्यक्ति अलग राज्य के निर्माण में अपनी भागीदारी निभा रहा था। भागीदार वो भी थे जो अपने घरों, मोहल्लों और गांवों में पुलिसिया गिरफ्त से बच कर पहुंचे अनजाने चेहरों को छत और खाना मुहैया करा रहे थे। भागीदार वो लोग भी थे जिन्होंने आंदोलन की कामयाबी की दुआएं मांगीं।

इस जन आंदोलन ने उत्तराखंड को बहुत कुछ दिया। अपमान, पीड़ा, शहादत, उत्पीड़न और बलात्कार की नींव पर उत्तराखंड राज्य का निर्माण हुआ और साथ ही मिली आंदोलन से उभरे नेताओं की नयी फौज। ये वो लोग थे जिनमें उत्तराखंड राज्य को लेकर भावनाओं का ज्वार था, कुछ सपने थे और व्यवस्था के प्रति एक आक्रोश था। सियासत में अधपके ये लोग सियासी दलों के खांटी नेताओं के लिये बहुत बड़ा खतरा थे जो नये राज्य के निर्माण में अपने लिये नयी संभावनाएं तलाश रहे थे। जो नेता जन आंदोलन की अगुवाई तक नहीं कर पाये वही नये राज्य की सियासत के सबसे बड़े सूबेदार बन कर अगली पंक्ति में जा खड़े हुए। नेताओं और नौकरशाहों के चमकते चेहरे अपनी सियासी और माली हालत में सुधार की पूरी गुंजाइश देख रहे थे। खतरा था तो बस उन नौजवानों और जागरूक बुद्धिजीवियों से, जो अपने सपनों के नये राज्य में पहाड़ के सुलगते सवालों का हल तलाश रहे थे। बस यहीं से शुरू हुई आंदोलन में भागीदारी के रिटर्न गिफ्ट बांटने की सियासत। नवोदित पर्वतीय राज्य के सियासी आकाओं ने आंदोलन से जुड़े लोगों को सहूलियतों, रियायतों, प्रमाणपत्रों और नौकरियों का झुनझुना दिखाना शुरू किया। ये वो सियासी दांव था जो और किसी भी नवोदित राज्य में नहीं चला गया। लोगों को भी लगा कि अगर सरकार उनके त्याग और बलिदान की कीमत चुका रही है तो इसमें बुरा क्या है। आंदोलनकारियों के चिह्नीकरण के नाम पर लोगों को खेमों में बांट दिया गया। अपने अपने लोगों को आंदोलनकारी घोषित करने की औपचारिकता शुरू हुई। आंदोलन के दौरान मारे गये शहीदों के नाम पर स्मारक बना कर औपचारिकता पूरी कर दी गयी। सोचा ये जाना था कि नये राज्य के पुराने मुद्दों का हल कैसे मिले, पहाड़ की दुश्वारियां कैसे दूर हों और विकास के सपनों को कैसे साकार किया जाये। लेकिन आंदोलन की कोख से जन्मे आंदोलनकारी अपनी ऊर्जा इस बात पर खर्च करने लगे कि आंदोलन में भागीदारी की ज्यादा से ज्यादा कीमत उन्हें कैसे मिले और दूसरों को कैसे नहीं। पहाड़ के वास्तविक मुद्दों को पेंशन की रकम, चिह्नीकरण में आ रही दिक्कत, सम्मान पाने की होड़ और रियायतों की झड़ी से ढक दिया गया। जुझारू लोगों को सुविधाभोगी बनाने की साजिश रची गयी। वो आंदोलनकारी जो नये राज्य के बेहतर निर्माण में नींव के पत्थर बन सकते थे उन्हें एक ऐसे ढांचे के कंगूरे बना कर सजा दिया गया जिसकी नींव में भ्रष्टाचार, ऐय्याशी, शराब माफिया, खनन माफिया, भू माफिया और अपराध जैसी दीमकें आज भी रेंग रही हैं। सियासी दलों को अपने इस दांव से राहत भी मिली और रोजगार भी। कुछ आंदोलनकारी आज भी राज्य के मुद्दों को लेकर छिटपुट लड़ाई लड़ रहे हैं लेकिन स्वार्थों की सियासत न तो उन्हें एकजुट होने दे रही है और न ही मजबूत। राज्य आंदोलनकारियों के नाम पर हो रही सियासत का ये एक ऐसा भद्दा चेहरा है जो लोगों के त्याग और कुर्बानियों को सरकारी पलड़े में तोल कर उसकी बोली लगा रहा है। हैरानी की बात तो ये है कि सियासत के इस मकड़जाल में फंसे लोग खुद आगे बढ़ चढ़ कर अपनी बोली लगा रहे हैं। जैसे कि वो आंदोलन में कूदे ही थे ये सब पाने के लिये। ये जनांदोलन और उससे जुड़े सपनों की मौत नहीं तो और क्या है?