शुक्रवार, 11 अप्रैल 2014
आम चुनाव, 2014: पाखंड के रास्ते पर राजनीति
मंगलवार, 6 अक्टूबर 2009
सलामी
ताज़ा ख़बर....ताज़ा ख़बर...ताज़ा ख़बर...
नेताओं को उठ कर सलाम करेंगे अफ़सर
चालान करने पर नेता ने सिपाही को पीटा
भीड़ ने थाना फूंका, वर्दी वालों को घसीटा
विधायक की बदसलूकी, अफ़सरों पर गाज़
फोन ना उठाने पर नेताजी हुये नाराज़
उसकी गर्दन की नसें खिंच गयीं...
कुछ और ख़बरें यादों में गुज़र गयीं
अपहरण, हत्या के आरोपियों को मिली ज़मानत
जनता ने उन्हें ही सौंप दी लोकतंत्र की अमानत
बढ़ने लगी हत्या, लूट और बलात्कार की वारदात
ख़ौफ में जीना भी जैसे हो गया हो आम बात
उसका चेहरा अपमान से काला पड़ चुका था
प्रजातंत्र का फल भीतर से कितना सड़ चुका था
अबे घूरता क्या है, साले तेरी वर्दी उतरवा दूंगा
सरकार है अब मेरी, तेरा ट्रांसफर करवा दूंगा
मेरे आदमियों को भूल से हाथ भी मत लगाना
सुबह शाम मेरे घर पर तुम हाजिरी बजाना
उसकी बर्दाश्त की हद पार होने लगी
वर्दी की इज़्ज़त तार तार होने लगी
और फिर एक दिन मारा गया सफ़ेदपोश
पास में पड़ा था एक और नेता बेहोश
नियति के चक्र का ये कैसा था खेल
एक को मिली जन्नत, दूसरे को जेल
दोनों के ही सिर पर सियासत का नशा भारी था
लेकिन अब भी सोच रहा वो पुलिस अधिकारी था
कि जनता के राज का ये कैसा दस्तूर है...
देनी पड़ेगी सलामी, वो कितना मज़बूर है।
धूल भरा फूल
प्रेमिका का ख़त आया
प्रेमी हर्षाया
जा पहुंचा उससे मिलने बाग़ में
लिये एक धूल भरा फूल अपने हाथ में
अधरों ही अधरों में मुस्कुराया
'प्रेम की पहली भेंट' कह कर प्रेमिका की ओर बढ़ाया
वह क्रोधित हो, फूल को पांव से रौंद कर ज़ोsर से चिल्लायी
प्रेमी की आंख भर आयी
शांत स्वर में बोला
न कर प्रेम का अपमान, ओ नादान
बिन कहे तुझे मैंने ज़िंदगी की हक़ीक़त दिखलायी है
प्रेम के इस सुगंधित फूल में
अपनी ग़रीबी की धूल मिलायी है।।
बुधवार, 2 सितंबर 2009
सपने-2..... एक लघु कविता
मुट्ठी भर रेत की तरह
धीरे-धीरे ग़ुम हो जाने के बावजूद
वो नहीं छोड़ता सपने देखना
क्योंकि
सत्ताधीशों की मंडी में
सिर्फ़ सपने ही
बिना क़ीमत बिकते हैं।
सपने-1..... एक लघु कविता
अचानक आंसू की तरह टपक पड़ते हैं
सपने
और उलझ कर
उसके लंबे स्याह केशों में
लहरा उठते हैं
किसी
खुशबूदार तेल के विज्ञापन की तरह।
सोच...एक लघु कविता
सोचो,
क्योंकि जीने के लिये ज़रूरी है कुछ सोचना
क्योंकि इंसान की फ़ितरत है सोचना
ये अलग बात है
कि
सोचते रहने से ज़िंदग़ी कम होती है...
मंगलवार, 2 जून 2009
कतरनों में क़ैद आम आदमी
सिर झटक कर मैंने ख़यालों की दुनिया से निकलने की कोशिश की लेकिन सोच इस तरह दिलोदिमाग़ पर हावी होती चली गयी जैसे किसी ने ऊन के गोले का एक सिरा पकड़ कर उसे ढलान पर लुढ़का दिया हो। एफआईआर लिखाने जैसी छोटी सी बात पर इतनी सहज़ता से रिश्वत की मांग, मैं शायद भीतर ही भीतर हिल चुका था। मुझे लगा जब मुसीबत का मारा कोई वाकई का आम आदमी मेरी जगह होता तो क्या उसे सहानुभूति के इतने शब्द भी सुनने को मिल पाते। लेकिन वो पुलिस वाला भी तो इस देश का एक आम आदमी ही है। क्या उसे खुद इस बात का अहसास नहीं कि वो क्या कर रहा है, या फिर ये सच है कि खाकी हो या खादी, वर्दी और कुर्सी किसी को भी आम नहीं रहने देती। तो फिर एक अरब से ज़्यादा के इस देश में आख़िर आम आदमी कितने हैं, किसी ना किसी को तो इसकी गणना करनी ही चाहिये। मैंने दिमाग़ पर ज़ोर डाल कर याद करने की कोशिश की लेकिन ऐसा कोई नज़र नहीं आया जिसे मैं बेचारे आम आदमी की उपाधि दे सकूं। शायद इसलिये कि अब आम हो या खास, हर कोई भ्रष्टाचार के रंग में रंग गया है, ये उसकी सांसों में ज़िंदग़ी की तरह घुल चुका है। बल्कि कुछ के लिये तो शायद ये उस स्कीइंग पैड की तरह है जिसे पहन कर ही आज की भागती दौड़ती ज़िंदग़ी के साथ कदम मिलाया जा सकता है। ये बात और है कि इस दौड़ में जरा भी क़दम फिसला तो बस.... गए। यही सोचते सोचते मैंने दरवाज़े की घंटी को दबाया। किर्र.... दरवाज़ा खोलते हुए पापा मुझे आज कुछ ज़्यादा ही खुश नज़र आये। मैं कुछ पूछता उससे पहले ही उन्होंने अख़बार की एक क़तरन मेरे हाथ में थमा दी, वो एक राष्ट्रीय दैनिक का संपादकीय था जिसमें भ्रष्टाचार से पीड़ित आम जनता के दर्द को आवाज़ देने की कोशिश की गयी थी। तो यही था पापा की आंखों में अचानक कई दिनों बाद उतरी चमक का राज़। उन्हें देख कर ऐसा लग रहा था जैसे सालों से सीमा पर बिना गोलियों की बंदूक से दुश्मन को डरा रहे सैनिक को अचानक एक दिन कारतूस का डिब्बा थमा दिया गया हो। और क्यों ना हो आख़िर बचपन से लेकर आज तक मैंने उन्हें अन्याय के ख़िलाफ़ संघर्ष में ही तो घिरा पाया है। शायद इसीलिये भ्रष्टाचार के विरोध में उठी किसी भी आवाज़ के साथ भावनात्मक रिश्ता गांठ लेना अब पापा की आदत में शुमार हो चुका है।
मेरा सोचना ग़लत नहीं था, अबकी बार पापा लौटे तो उनके हाथों में अख़बारों की पुरानी कतरनें और वो कागज़ थे जो पिछले तीस सालों में बढ़ते बढ़ते एक पुलिंदे की शक्ल ले चुके हैं। साठवां बीतने के बाद अब ये क़तरनें ही उनकी ज़िंदगी की पूंजी हैं और उनके लंबे चौड़े संघर्ष की अनगढ़ी इबारत भी। कॉमरेड पी सी जोशी के निर्देश पर अपनी जमी जमायी वक़ालत छोड़ उत्तराखंड के सुदूर पिथौरागढ़ में आकर वामपंथी राजनीति के क्रांतिकारी तेवरों के साथ सामाजिक राजनीतिक जीवन में कूदते हुए पापा ने विचारों के जिस प्रवाह में क़दम रखा था उसने आज तक उन्हें किनारा भले ही न दिया हो लेकिन रीढ़ की हड्डी में सिर उठा कर चलने की ताक़त ज़रूर दी। स्वतंत्रता सेनानी परिवार में जन्म लेने के गौरव का इस्तेमाल निजी हित में न करते हुए पापा ने इसे एक नये तरह के आंदोलन का आधार बनाया। सत्तर और अस्सी के दशक में कस्तूरी कांड, सीमेंट घोटाला और रामगंगा पेयजल योजना में भ्रष्टाचार जैसे कई मामलों का स्थानीय और प्रादेशिक स्तर पर भंडाफोड़ करते हुये उन्होंने जो मुहिम शुरू की थी वो कुलीनों के इतिहास में भले ही दर्ज़ न हो पायी हो लेकिन उनसे जुड़ी अख़बारी क़तरनें अब मेरे पूरे परिवार के भूत, भविष्य और वर्तमान का अटूट हिस्सा बन चुकी हैं। मुझे लगा ढेर सारी अख़बारी क़तरनों के बीच घिरा मेरा बाप ही क्या वो आम आदमी नहीं है जिसकी मुझे सुबह से तलाश थी? हां वो आम ही तो है, दुनिया की नज़रों में बेहद मामूली सा इंसान। जो आज भी अपने भीतर उम्मीद की एक किरण पाले हुए है कि सब कुछ ठीक हो सकता है। जो अब भी मेरी मां की पेंशन के लिये किसी ऑफिस में रिश्वत देने की बज़ाय अधिकारी का गला पकड़ने का हौसला रखता है।
स्किपी की याद में....


लोग कहते हैं वो नहीं थी किसी इंसान से कम,पर वो इंसानों से ज़्यादा वफादार थी
गोया लबों पर नहीं थी उसके कुदरती हंसी, फिर भी हमारे लिये खुशियों का भंडार थी
उसके बालों पर रोज फिरते थे स्नेह के हाथ, शायद इसीलिये वो इतनी चमकदार थी
आंखों में उसकी रहते थे हरदम ढेरों सवाल, पूछने की आदत तो और भी गरज़दार थी
वो हर हाल में हिलाना अपनी नन्हीं सी दुम, ग़म और खुशी में मानो वो एकसार थी
इशारे पर गुर्राना, दौड़ कर गोदी में सिमट आना, उसकी तो हर एक अदा यादगार थी
चंद लम्हों में जितना प्यार बांट कर गयी, उससे कहीं ज़्यादा वो प्यार की हकदार थी
सोमवार, 1 जून 2009
कविता का दुर्भाग्य
मौत से बहुत डरता हूं
इसलिये
सिर्फ़ मौत पर कविता करता हूं
मौत इंसान की हो या पशु की...
माता की हो या शिशु की..
एक मौत
यानी एक कविता
अभी तक ना जाने कितनी मौतें मेरी कविता बनी हैं...
जाने कितने मजहबों के लहू से सनी हैं..
अब तो पूरा संकलन बन चुका है
जिसका नाम मैंने एकता रखा है..
मौत धर्मनिरपेक्ष होती है..
क्योंकि वो धर्म या जाति के आधार पर नहीं आती है..
आती है और किसी को भी ले जाती है
इसलिये मौत लो और धर्मनिरपेक्ष हो जाओ..
नेता हो तो मौत की राजनीति अपनाओ...
मेरी कविता ज़िंदगी से दूर है
क्योंकि
ज़िंदगी पर लिखना उतना ही कठिन है
जितना ज़िंदगी को जीना
इसीलिये मेरी कविता का विषय सदा मौत रहा है..
ज़िंदगी की तरह मौत को ढूंढना नहीं पड़ता
वो आजकल हर जगह मिल जाती है
हर समझदार व्यक्ति अब इसे अपना चुका है
ये विषय
अब राष्ट्रीय महत्व पा चुका है...
मौतें होती हैं तो संपादक संपादकीय लिखता है..
मरने वाले के परिवार को मुआवज़ा मिलता है
नेता उनका अस्थिकलश बनवाता है
और वोटों के लिये गली गली घुमाता है...
लेकिन
मैं उस मौत को सहेज लेता हूं अपनी कविता बना कर
जोड़ देता हूं किताब के मध्य पन्ना
इस आस में कि
शायद
इतने लोगों का बलिदान व्यर्थ ना जाये
और
मुझे इस संकलन पर कोई पुरस्कार मिल जाये..
मौतें अब मेरी ज़रूरत बन चुकी हैं..
सोचता हूं जिस दिन कोई नहीं मरेगा
उस दिन मुझे मरना होगा
एक कविता बन संकलन में छप जाने के लिये
मौतें होना ही मेरे कवित्व का सौभाग्य है...
और शायद यही
मेरी कविता का दुर्भाग्य है.....
शुक्रवार, 1 मई 2009
जनता तेरी ही जय हो.....

गरीबी का नाश हो, ना भूख हो ना भय हो
इस बार चुनाव में जनता तेरी ही जय हो
ना मरे अब कोई किसान,अच्छे बुरे की हो पहचान
अब न कोई ले सके हमारे हौसलों का इम्तिहान
दुश्मन से टकराने को हर कदम निर्भय हो
इस बार चुनाव में जनता तेरी ही जय हो
हर हाथ को काम मिले,हर चेहरे पर हो मुस्कान
विकास की बंदरबांट में छूट न पाये कोई इंसान
जन जन के वोट से सबकी किस्मत तय हो
इस बार चुनाव में जनता तेरी ही जय हो
ना मज़हब की दीवारें हों,जात पांत पर ना हो ध्यान
नेता वही जो रह ना पाये लोगों के दुख से अनजान
सत्ता के सुख पर निस्वार्थ की विजय हो
इस बार चुनाव में जनता तेरी ही जय हो
बहुत हुए अब झूठे वादे,मिटने ना देंगे देश की शान
आओ संसद से हटाएं दागियों का नामोनिशान
देश में विकास की एक नयी लय हो
इस बार चुनाव में जनता तेरी ही जय हो
